न्यूनतम मज़दूरी पर मोदी सरकार का ज़ोर का झटका

बजट से पहले आनन फानन में वेज को मोदी कैबिनेट से हरी झंडी दे दी गई ये प्रचारित करते हुए कि मोदी सरकार पूरे देश में न्यूनतम मज़दूरी लागू करने का क़ानून लाएगी।

देश भर के 40 करोड़ मज़दूरों के साथ धोखाधड़ी

लेकिन जैसे जैसे वेज कोड की दबी छुपी बातें सामने आ रही हैं, ऐसे ऐसे खुलासे हो रहे हैं।

जिससे ट्रेड यूनियनें भी हैरान हैं।

नई जानकारी है कि मोदी सरकार की जिस वेज कोड बिल को संसद में पेश करने जा रही है।

उसमें राष्ट्रीय स्तर पर न्यूनतम वेतन 180 रुपया तय किया है।

जोकि इसी सरकार के पैनल के 375 रुपये के प्रस्ताव से उलट है।

कोलकाता से छपने वाले प्रतिष्ठित अंग्रेज़ी अख़बार द टेलीग्राफ़ में बसंत कुमार मोहंती की एक रिपोर्ट 13 जुलाई को प्रकाशित हुई है।

जिसमें ये खुलासा किया गया है। रिपोर्ट के अनुसार, सरकार की कारस्तानी पर ट्रेड यूनियन नेता और स्वतंत्र आलोचकों ने नाराज़गी जताई है और इसे देश भर के 40 करोड़ मज़दूरों के साथ धोखाधड़ी क़रार दिया है।

बुधवार को केंद्रीय श्रम मंत्री संतोष गंगवार ने प्रेस कांफ्रेंस में पत्रकारों को बताया कि न्यूनतम मज़दूरी 178 रुपये होगा।

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40 करोड़ मज़दूर प्रभावित होंगे

हालांकि इसमें भी मंत्री जी ने पूरी बात नहीं बताई।

गंगवार ने कहा कि तीन जुलाई को पहले लेबर कोड को कैबिनेट ने हरी झंडी दे दी थी  “अब इसी किसी भी दिन लोकसभा में पेश किया जा सकता है और इससे देश के 40 करोड़ मज़दूर प्रभावित होंगे।”

कुछ राज्यों में न्यूनतम वेतन 50, 60 और 100 रुपये है। हमने फैसला किया है कि अब पूरे देश में एक समान न्यूनतम वेतन 178 रुपये होगा।

लेकिन गंगवार ने जो बात छिपाई वो ये कि ये प्रस्तावित न्यूनतम मज़दूरी सरकार के एक विशेषज्ञ कमेटी द्वारा निर्धारित न्यूनतम मज़दूरी के आधे से भी कम है।

इस कमेटी की अगुवाई अनूप सतपथी ने की थी, जिसने जुलाई 2018 के महंगाई के आधार पर सभी राज्यों के लिए 375 रुपये प्रति दिन न्यूनतम मज़दूरी करने का सुझाव दिया था।

अगर वेज कोड बिल संसद में पास हो जाता है तो ये पूरे देश के लिए लागू होगा। मोदी सरकार ने 2017 में फ्लोर लेवल मिनिमम वेज 176 रुपये प्रति दिन तय किया था।

जोकि पूरे देश के लिए अनिवार्य नहीं था।

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न्यूनतम मज़दूरी 176 रुपये मज़दूरों के लिए पर्याप्त नहीं

साल 1996 में शुरू किए गए फ्लोर लेवल प्रक्रिया से ही हर दो साल में न्यूनतम वेतन को संशोधित कर घोषित किया जाता है और पिछली घोषणा की समय सीमा इस इसी महीने ख़त्म हो रही है।

ऐसे में कुछ लोग आशंका जता रहे हैं कि राष्ट्रीय न्यूनतम मज़दूरी की घोषणा के साथ ही फ़्लोर लेवल प्रक्रिया का भी पटाक्षेप हो सकता है।

इस तरह देखा जाए तो दो सालों में सरकार ने न्यूनतम मज़दूरी में दो रुपये की ‘भारी’ बढ़ोत्तरी की है।

असल में न्यूनतम मज़दूरी से संबंधित सेंट्रल एडवाइज़री बोर्ड के सुझाव पर ही सतपथी कमेटी का गठन हुआ था।

इस बोर्ड में सरकार के अलावा ट्रेड यूनियन के प्रतिनिधि भी होते हैं, जिनका कहना था कि फ़्लोर लेवल न्यूनतम मज़दूरी 176 रुपये मज़दूरों के लिए पर्याप्त नहीं है।

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यूनियनों से सलाह मशविरा के इसे तय करने पर अपनी नाराजगी भी जाहिर की

सतपथी कमेटी ने भोजन, पोषण, परिवहन, मनोरंजन समेत कई मदों को अपने हिसाब किताब में शामिल किया था।

कमेटी की रिपोर्ट पर सुझाव के लिए इसे श्रम मंत्रालय ने इसी साल फ़रवरी के महीने में अपने वेबसाइट पर डाला भी था।

आरएसएस से जुड़ी मज़दूर ट्रेड यूनियन बीएमएस ने 178 रुपये को बेकार बताया और बिना ट्रेड यूनियनों से सलाह मशविरा के इसे तय करने पर अपनी नाराजगी भी जाहिर की है।

हालांकि वर्कर्स यूनिटी से बात करते हुए कुछ आरएसएस से जुड़ी मज़दूर नेताओं ने मिनिमम वेज का स्वागत किया था।

टेलीग्राफ़ से बात करते हुए बीएमएस के जनरल सेक्रेटरी वृजेश उपाध्याय ने कहा, “पुराने फ्लोर लेवल रेट को ही नए क़ानून के तहत पेश करने का क्या मतलब है?”

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44 श्रम क़ानूनों को ख़त्म कर इनकी जगह चार श्रम कोड या लेबर कोड प्रस्ताव

कुछ लेबर इकोनोमिस्ट का कहना है कि कम से कम सरकार को इसी महीने संशोधित होने वाले फ्लोर लेवल रेट का इंतज़ार तो कर लेना चाहिए था।

इससे पहले नये फ्लोर लेवल रेट को 200 रुपये तक पहुंचने की उम्मीद की जा रही थी।

गौरतलब है कि मोदी सरकार ने अपने पिछले ही कार्यकाल में 44 श्रम क़ानूनों को ख़त्म कर इनकी जगह चार श्रम कोड या लेबर कोड प्रस्ताव किए थे

और दूसरी बार सरकार बनते ही उसने पहला लेबर कोड आगे बढ़ाने में कोई देरी नहीं की।

ट्रेड यूनियन नेताओं का कहना है कि श्रम क़ानूनों को निरर्थक बना देने की ये मोदी सरकार की चाल है और नए नए जुमलों के पीछे श्रम क़ानूनों का सर कलम किए जाने की साजिशें रची जा रही हैं।

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