नीमराना के जापानी ज़ोन में भारतीय मजदूरों की बर्बर स्थिति

कांग्रेस की मनमोहन सरकार ने अपने कार्यकाल में देश भर में विशेष औद्योगिक क्षेत्र बनाए, जिन्हें स्पेशल इकोनॉमिक ज़ोन यानी सेज़ कहा गया।

ऐसा ही सेज़ राजस्थान के नीमराना में बनाया गया है जहां जापानी ज़ोन और इंडियन ज़ोन के नाम से दो इलाक़े हैं।

इन कंपनियों में काम करने के अलग-अलग नियम क़ायदे हैं।

डाईकिन में काम करने वाले एक पूर्व कर्मचारी दीपक कुमार दोनों ज़ोन का हाल बताते हुए कहते हैं कि आज विदेशियों से ज्यादा बर्बर स्थिति भारतीय कंपनियों की है।

जापानी जोन में मजदूरों के लिए काम की समय सीमा आठ घंटे तय की गई है। वहीं इंडियन जोन में मजदूरों को 12 घंटे काम करना पड़ता है।

जापानी जोन में सभी कर्मचारियों को एक समान खाने की सुविधा दी गयी है।

वहीं इडियन जोन में यह सुविधा केवल मैनेजमेंट तक ही सीमित है। मजदूरों को खाने के लिए बेकार खाना दिया जाता है।

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केवल 25 से कम उम्र के लोगों को नौकरियां प्राप्त

वह आगे बताते है कि जपानी जोन में कर्मचारियों के लिए बसों की सुविधा उपलब्ध है। लेकिन इंडियन ज़ोन में सिर्फ हैवल्स कंपनी में बस सेवा उपलब्ध है।

उस सुविधा के लिए भी मजदूरों को 300 रूपये महीना देना पड़ता है।पैसे नहीं देने पर मजदूरों को बसों में बैठने नहीं दिया जाता है।

नीमराना में स्थित हीरो कंपनी में हर 6 महिनें में पुराने मजदूरों को निकालकर नए मजदूरों को रखा जाता है।

धीरे-धीरे कंपनी में नया नियम भी लागू किया गया कि 25 से कम उम्र के मजदूरों को काम पर रखा जाएगा।

क्योंकि कंपनी का मानना है कि बढ़ती उम्र के साथ व्यक्ति की कार्य क्षमता कम हो जाती है।

जिस कारण 25 से अधिक उम्र होने पर मजदूरों को बेरोजगारी का सामना करना पड़ता है।

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फोटो साभार फेसबुक
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जापानी ज़ोन भी इंडियन ज़ोन की श्रेणी की ओर अग्रसर

आगे दिपक कुमार कहते है कि धीरे-धीरे जापानी ज़ोन भी इंडियन ज़ोन की श्रेणी आ रहा  है।

जपानी जोन में भी कई ऐसी कंपनियां है जिनमें ऊपरी तौर पर काम की समय सीमा 8 घंटे बताया जाता है।

लेकिन सच्चाई कुछ और ही है। दोनों ज़ोन में सैलरी भी एक समान दी जाती है।

इंडियन ज़ोन में 12 घंटे काम करने के बाद  भी परमानेंट मजदूरों कि सैलरी 13000 है।

ठीक वहीं स्थिति जापानी ज़ोन के मजदूरों की भी है।

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मजदूरों के बैठकर काम करने पर रोक

वह आगे हैवल्स कंपनी की चर्चा करते हुए कहते है कि हैवल्स कंपनी में मजदूर सीएएफल बैठ कर बनाया करते थे।

लेकिन अब मैंनेजमेंट ने मजदूरों के बैठकर काम करने पर प्रतिबंध लगा दिया है।

पहले एक लाइन में 46 कर्मचारी काम करते थे लेकिन आज एक लाइन में केवल 30 कर्मचारी काम करते है।

इंडियन ज़ोन की कंपनियों में यह नियम है कि कर्मचारियों के टी ब्रेक औऱ लंच के भी पैसे काटे जाते है।

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काम के अनुसार वेतन बहुत कम

वेंडर जैसी कंपनियां जो डाईकिन, विडियोकॉन और एल.जी के पार्टस बनाती हैं।

इन कंपनियों में परमानेंट कर्मचारियों को 9000 सैलरी मिलती है। मजदूरो को उनके काम के हिसाब से बहुत कम सैलरी दी जाती है।

डाईकिन में काम करने वाले कर्मचारियों को पूरे 12 घंटे में 3 से 4 बार पानी पीने के लिए जाने दिया जाता है।

साथ ही कर्मचारियों को कोई छुट्टी नहीं दी जाती यदि वह छुट्टी करते है।तो उन्हें रिजॉयनिंग कर दिया जाता है।

जिस कारण मजदूरों को नए जगह काम करना पड़ता है। वहां भी उन्हें उतनी ही सैलरी में रखा जाता है।

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