कर्ज़ सरकार पर होता है पर चुकाता है मज़दूर वर्ग

(By मुकेश असीम)

इतिहास  गवाह है कि भारी कर्ज में फंसी किसी भी सरकार ने अपना कर्ज कभी भी  ईमानदारी से चुकाया नहीं है।

एक बार राष्ट्रीय कर्ज़ (अर्थात सरकार पर कर्ज़ ) एक हद पार कर जाता है तो ऐसा एक भी ज्ञात अवसर नहीं है, जब सरकार ने  यह कर्ज उचित एवं पूरी तरह चुकाया गया हो।

कर्ज से सरकारी राजस्व की मुक्ति अगर कभी हुई है तो दिवाला निकलकर ही हुई है।

पर दिवाला घोषित रूप से कम ही निकलता है,अक्सर  फर्जी भुगतान दिखाकर उसे छुपा दिया जाता है, पर दिवाला हमेशा असली होता है।

हम सब देखे  रहे है कि पिछले 5 साल में सरकार पर ज्ञात कर्ज भयानक रफ्तार से बढ़ा है

जबकि इसका एक और बड़ा हिस्सा सार्वजनिक संस्थानों के जरिये छिपाकर अज्ञात ही रखा गया है।

कर्ज की वसूली मेहनतकश वर्ग

इस कर्ज का सबसे बड़ा हिस्सा का भुगतान बैंक खातों में जमा रकम से आता है जैसे- 

1. बैंक/डाकखाने की लघु बचत योजनाओं से

2.पेंशन-पीएफ के पैसे से

3.बीमा प्रीमियम की जमा रक़मों से

इन में अधिकांश मेहनतकश वर्ग  के लोग अपनी बचत रखते हैं, अभी मजदूरों की आय का हिस्सा भी सरकार ने जनधन खातों में जमा करा लिया है।

कर्जे का गणित

 एडम स्मिथ बिल्कुल सही कहते हैं कि, “ज्ञात इतिहास में भारी कर्ज में फंसी किसी भी सरकार ने अपना कर्ज कभी ईमानदारी से चुकाया नहीं है।”

जब सोने-चाँदी के सिक्कों का चलन था, तो शासक वर्ग सिक्कों का वजन कम या उनमें मिलावट कर असली धातु की मात्रा घटा उन सस्ते सिक्कों से आम लोगों को ठगता था 

पर अब वायदा मुद्रा अर्थात कागजी नोटों या खातों में जमा रूपया से यह काम मुद्रा प्रसार को बढ़ाकर किया जाता है।

अर्थशास्त्र का नियम है कि किसी देश में वर्ष में उत्पादों/सेवाओं की कुल आपूर्ति का जितना मूल्य हो और एक सिक्का/नोट औसतन जितनी बार प्रयोग में आता हो, उसके आधार पर कुल मुद्रा की मात्रा तय होती है।

उदाहरण के तौर पर एक देश में कुल माल आपूर्ति 1000 रु है और 1 रु का सिक्का साल में 10 बार प्रयोग होता है तो अर्थव्यवस्था चलाने हेतु 10 रु के 100 नोट होने चाहिए

अगर इससे अधिक मुद्रा प्रचलन में होगी यानी 100 की जगह सरकार 120 नोट जारी करती है, तो 120 रु का मूल्य घटकर 100 रु ही रह जाएगा

यानी  1 रु का मूल्य 20 पैसे  घट जाएगा और जिनकी आय निश्चित है उसमें 20% की हानि होगी

पूँजीपतियों को करोड़ की  रियायतें

अभी सरकार पहले से भारी घाटे में है, कर्ज के बोझ से दबी है, प्रत्यक्ष/अप्रत्यक्ष कर वसूली बजट लक्ष्य से बहुत नीचे है।

ऊपर से वह पूँजीपतियों को लाखों करोड़ की कर रियायतें दे रही है।

अब समाज के सबसे अमीर आयकर दाताओं को रियायत की तैयारी है तो यह सब रकम कहाँ से आने वाली है?

मुद्रा प्रसार बढ़ाने से, इससे समाज के सबसे गरीब तबकों जिनकी मजदूरी/आय मुद्रा प्रसार की गति के सापेक्ष धीमी गति से बढ़ेगी, उनकी वास्तविक आय दरअसल कम हो जायेगी।

यहाँ भी एडम स्मिथ वाली बात सही होगी जब सरकार का दिवाला तो निकलेगा।

लेकिन वह इसे फर्जी भुगतान के जरिये मेहनतकश जनता के सिर पर लाड़ देगी जो दिन दहाड़े डकैती जैसा ही होगा।

(मुकेश असीम की फेसबुक लेख के आधार पर )

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