दुनिया के मज़दूरों एक हो के नारे में कहां हैं कश्मीरी मज़दूर

By आशीष सक्सेना

दुनिया के मज़दूरों एक हो, कश्मीरी मज़दूरों को छोडक़र…

अजीब लगा न ये नारा।

ऐसा कैसे हो सकता है कि अंतरराष्ट्रीय मजदूर एकता में कश्मीर के मेहनतकश शामिल न हों। कश्मीर अनजान ग्रह पर मौजूद तो है नहीं।

इसके उलट सच ये भी है कि कश्मीरी मजदूरों-मेहनतकशों से साथ एकता बनाने में भारत के ट्रेड यूनियन आंदोलन को ख़ास दिलचस्पी नहीं है।

उन्होंने इससे पहले भी कश्मीरी मज़दूरों को लेकर विशेष तौर पर कभी पक्ष नहीं रखा। ये आंदोलन न अपना दामन बचा पा रहा है और न ही देश की उत्पीड़ित कौमों के मज़दूरों आन बचा बचाने की कोशिश कर रहा है।

मजदूरों  विरोधी सरकार का कश्मीर में अनुच्छेद 370 हटाने का फैसला आया तो मजदूर तबके में भी अधिकांश हिस्सा अंधराष्ट्रवादियों की कतार में खड़ा दिखाई दिया।

कथित समझदार कहे जाने वाले, मजदूरों के अंतरराष्ट्रवाद की पैरोकारी करने वाले श्रमिक महासंघों ने बहुत देर बाद इतना ही ऐतराज जताया कि कश्मीर के लोगों को भरोसे में लेना चाहिए था। कश्मीर के लोगों पर अत्याचार नहीं होना चाहिए।

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क्या कश्मीर मुद्दा  सिर्फ़ अलगाववाद से जुड़ा है?

ये ऐसा पक्ष है, जिसको लोकतांत्रिक नजरिए से ठीक कहा जा सकता है, लेकिन मजदूरों वर्ग के नजरिए से संपूर्ण बात बिल्कुल भी नहीं है।

संसदीय, गैर संसदीय अधिकांश वामपंथी दलों और उनके मजदूरों संघों और संगठनों ने इसी आधार पर ऐतराज दर्ज कराया और येन केन प्रकारेण कश्मीरी अलगाववादियों के पक्ष के आसपास खड़े दिखाए दिए।

उन्होंने इससे पहले भी कश्मीरी मजदूरों को लेकर विशेष तौर पर कभी पक्ष नहीं रखा।

उनके साथ होने वाली ज्यादती को लेकर विरोध प्रदर्शन नहीं किया और न ही कश्मीरी मजदूरों के संघर्षों के समर्थन में कोई विशेष विरोध दर्ज नहीं कराया।

भारत के मजदूर आंदोलन की ये बड़ी खामी है कि जड़ता के चलते मजदूरों वर्ग के नजरिए से सोचना नहीं चाहता।

पुलवामा कांड के समय सभी हतप्रभ से रह गए, जैसे हस्तशिल्प कारीगरों या बोझा ढोने वाले कश्मीरियों से एकता जाहिर करने पर जान ख़तरे में पड़ जाएगी।

काफी बाद में तब जाकर विरोध दिखाया कुछ ने, जब सुप्रीम कोर्ट ने ही कह दिया कि कश्मीरियों के साथ मारपीट की घटना पर लगाम लगाई जाए।

प्रधानमंत्री का भी बयान आ गया कि कश्मीरी बच्चों की हिफाजत हमारी जिम्मेदारी है। असल में भारत के मजदूर आंदोलन की ये बड़ी खामी है कि जड़ता के चलते मजदूरों वर्ग के नजरिए से सोचना नहीं चाहता।

शास्त्रीय सूत्रों में बंधकर सर्वहार के संघर्ष की हवाहवाई बातों में उलझा रहता है। कश्मीर मामले में भी यही है।

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women demand regularization of jobs in kashmirघाटी में नौकरियों को स्थाई करने की डिमांड को लेकर लंबे समय से आंदोलन चल रहा है। इस तस्वीर को एपी के डार यासिन ने 2011 में खींची थी।

कश्मीरी मज़दूरों की बात कौन करेगा?

कश्मीर में सबसे ज्यादा उत्पीडि़त तबका सिर्फ मजदूरों हैं, वही आबादी में भी ज्यादा हैं, लाखों में। गैर कश्मीरी मजदूरों को वहां के मजदूरों की संख्या, उनके काम, उनके संघर्ष के बारे में कभी शिक्षित ही नहीं किया।

केवल वहां के राष्ट्रीयता के सवाल को बताया, कि देश का बंटवारा हुआ, राजा हरीसिंह ने ये किया, बाद में भारत और पाकिस्तान की सरकार ने वो किया। संयुक्त राष्ट्र ने फलाना किया, चीन-अमेरिका ठिकाने में दिलचस्पी ले रहे हैं।

बेशक, उस पर भी बात होना चाहिए, लेकिन ये कि विलय से पहले जम्मू-कश्मीर की उत्पीड़ित जनता किससे संघर्ष कर रही थी और क्यों कर रही थी।

उनके संघर्ष का विकास आगे क्या हुआ और आज मजदूरों-किसान किस हालत में हैं। केवल डल झील और खूबसूरत वादियों के सहारे पर्यटन पर पेट पाल रहे लोगों की समस्या बताना भी काफी नहीं है।

कश्मीर में सबसे ज्यादा उत्पीडि़त तबका सिर्फ मजदूरों हैं, वही आबादी में भी ज्यादा हैं, लाखों में।

हस्तशिल्प, सेब की खेती से लेकर ट्रांसपोर्टेशन, होटल, मछली पालन, केसर और रेशम की पैदावार में लगे इन लाखों लोगों के लिए के लिए आवाज कौन उठाएगा।

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जम्मू और कश्मीर खनिज

सरकारें यहां के कुदरती खजाने को लूटने की कोशिश में हैं। जबकि वे भारत सरकार, पाकिस्तान सरकार, आतंकी संगठन और अलगाववादियों की गोलियों-नीतियों के शिकार हैं।

वे भारत के बाकी हिस्सों में ही नहीं पिटते, कश्मीर में भी उनकी मेहनत का दाम नहीं मिलता।

अलगाववादी नेताओं और उनमें देखने भर से भी फर्क दिखाई दे सकता है, शक्लें और जीवनशैली देखकर भी। अलगाववादियों के पास दौलत है, वे खुदमुख्त्यारी चाहते हैं और सबके उत्पीडऩ का लाभ उठाते हैं।

सरकारें यहां के कुदरती खजाने को लूटने की कोशिश में हैं। इन श्रमिकों को अनुच्छेद 370 में एक बदलाव हो या 70, कोई फर्क नहीं। उनकी बदहाली जस की तस ही रहना है। राज्य में लगभग 20 सार्वजनिक क्षेत्र की इकाइयां हैं।

1960 में खनिज संसाधनों का दोहन करने के लिए शुरू हुआ था। सरकार के अनुसार बीस में सिर्फ चार लाभ में हैं, बाकी नुकसान में हैं।

राज्य सरकार ने ‘बीमार’ घोषित करने के बाद दो पीएसयू, जेएंडके हिमालयन वूल कॉमर्स और इसकी सहायक जेएंडके हैंडलूम को बंद कर दिया।

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मज़दूर संघर्ष का लंबा इतिहास

जम्मू-कश्मीर में मजदूरों  संघर्ष का एक लंबा इतिहास है। अन्य सार्वजनिक उपक्रमों में कर्मचारी एक हारी हुई लड़ाई लडने की कोशिश कर रहे हैं।

आयोगों ने राज्य के अधिकांश सार्वजनिक उपक्रमों को बंद करने की सिफारिश की है। शेष भारत की तरह इस राज्य में भी चार कोड बिल लागू होंगे, जबकि यहां श्रमिक अधिकार वैसे भी कहां थे।

उद्यमों की कम मौजूदगी या भारत के ट्रेड यूनियन आंदोलन का सहारा न होने का मतलब यह नहीं है कि यहां के मजदूर अपने अधिकारों के लिए लड़ नहीं रहे हैं। जम्मू-कश्मीर में मजदूरों  संघर्ष का एक लंबा इतिहास है।

1924 में पहली बार हड़ताल हुई थी, जब राज्य के रेशम मिल में पांच हजार मजदूरों ने वेतन वृद्धि की मांग की।

उस समय पिकेट लाइन पर श्रमिकों को बुरी तरह से पीटा गया और मुख्य नेता को पुलिस हिरासत में गिरफ्तार कर हड़ताल बेरहमी से तोड़ी गई। तब देसी रिसासत के दम पर अंग्रेज सत्ता में काबिज थे।

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निजी क्षेत्र के मालिक फायदे में

वेतन और अन्य भत्तों का भुगतान नहीं होने पर 2001 में अधिकांश सार्वजनिक उपक्रमों को एकजुट किया गया और बड़े पैमाने पर हड़ताल की गई।

असल शोषण-उत्पीडऩ निजी क्षेत्र में पहले ही बहुत है। अलगाववादी संघर्ष के कारण निजी क्षेत्र के मालिक फायदा उठाते हैं।

इस बुनियाद पर उनको सरकारी रियायत मिलती है और मजदूरों को ठेंगा। कहा जाता है कि निवेशक भाग जाएंगे, इसलिए हर खून चुसवाने में आनाकानी न हो।

ऐसे में स्थानीय यूनियनों की ढाल मजदूरों के किसी काम नहीं आती। दिसंबर 2003 में यही हुआ।

भीलवाड़ा समूह के स्वामित्व वाली जम्मू के बारी ब्राह्मण में 1200 कर्मचारियों वाली कपड़ा कंपनी मॉरल ओवरसीज ने 65 अस्थायी कामगारों को मंदी का हवाला देकर निकाल दिया।

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मज़दूरों के दुश्मन चरमपंथी भी

वैसे यूनियन बनाने के प्रयास में बाकी भारत में भी कोई आसानी तो नहीं है, कई जगह लोगों को निकाला गया है।

कुछ रिपोर्ट ऐसा भी कहती है कि उन्हें यूनियन बनाने की कोशिश में बर्खास्त कर दिया गया। बर्खास्त कर्मचारियों ने कंपनी कार्यालय पर हमला किया, जिसके बाद प्लांट अस्थायी तौर पर बंद हो गया।

प्रबंधन ने चतुराई से कहा कि कंपनी स्थानीय लोगों के लाभ के लिए काम कर रही थी,  65 श्रमिकों को बर्खास्त करना उनका अधिकार था।

मैन्युअल लेबर के तौर पर बड़ी तादाद में कश्मीरी दूसरे राज्यों या शहरों में काम करते हैं। हालांकि उन्हें हमेशा संदेह की नजर से देखा जाता है। अविभाजित भारत में वे लाहौर (पाकिस्तान) बंदरगाह पर भी काम को जाते रहे।

काफी मजदूर तो आतंकवादियों ने मार दिए, जिनकी पहचान नहीं हुई। अब वे हिमाचल प्रदेश के कई शहरों के बस स्टैंड पर बोझ उठाते ज्यादा दिखते हैं।

शिल्पकार शॉल, शिल्प, या केसर जैसे उत्पादों को बेचने के लिए मौसमी रूप से दूसरे राज्यों में पलायन करते हैं। इसका उल्टा भी होता है। दूसरे राज्यों से गरीब मजदूर कश्मीर में काम को आते हैं।

इन स्वैच्छिक या मजबूर प्रवासी मजदूरों के पंजीकरण की कोई व्यवस्था नहीं है। ऐसे में उनके साथ कोई हादसा हो जाने पर पहचान भी मुश्किल ही होती है, कोई भी नाम दिया जा सकता है उस वक्त उनके लिए।

अकेले कश्मीर घाटी में हर साल लगभग डेढ़ से दो लाख प्रवासी मजदूर काम करते हैं। कश्मीर और लद्दाख संभाग में वे केवल गर्मियों में काम करते हैं, लेकिन जम्मू संभाग में वे पूरे साल काम करते हैं।

परिवार पालने के लिए वे रोजाना 300-350 रुपये रोज पर काम करने को ये खतरा मोल लेते हैं। अकेले कश्मीर घाटी में हर साल लगभग डेढ़ से दो लाख प्रवासी मजदूर काम करते हैं।

अधिकांश निर्माण मजदूर होते हैं। एशिया मॉनीटर रिसोर्स सेंटर की रिपोर्ट बताती है कि 2001 में श्रमिकों की संख्या भी 39 प्रतिशत बढक़र 36.8 लाख हो गई।

protest of All Kashmir Gold Dealers and Workers Association
ये तस्वीर 2016 की है जब ऑल कश्मीरी गोल्ड डीलर्स और वर्कर्स एसोसिएशन ने अपनी मांगों को लेकर श्रीनगर में प्रदर्शन किया।
यूनियनें क्यों नहीं उठातीं कश्मीरी मज़दूरों की आवाज़?

जिसमें से औपचारिक श्रमिकों की 25.3 लाख और सीमांत श्रमिकों की 11.5 लाख संख्या थी। तब, यानी 18 साल पहले कुल मेहनतकशों की संख्या का लगभग 43.36 प्रतिशत किसान थे।

6.74 प्रतिशत खेतिहर मजदूर और बाकी 49.9 प्रतिशत घरेलू उद्योगों सहित अन्य गतिविधियों में लगे थे।

महिला कर्मचारियों की तादाद लगभग 28.4 प्रतिशत थी। सीमांत महिला श्रमिकों की हिस्सेदारी कुल महिला श्रमिकों का 66.84 प्रतिशत थी।

इनके लिए आवाज उठाना किसी मजदूर संघ को शायद मुनासिब नहीं लगा।

इसके बावजूद कश्मीरी कारीगरों की आय 1980 के दशक से नहीं बढ़ी है। जम्मू कश्मीर में हस्तशिल्प निर्माण के पांच लाख से ज्यादा कारखाने या अड्डे हैं।

राज्य में हस्तशिल्पी मजदूरों की कुल संख्या लगभग 11 लाख है, जिनमें पुरुष श्रमिक 81 प्रतिशत और महिला श्रमिक 19 प्रतिशत हैं।

इंडस्ट्री एंड कॉमर्स की बैठक में कुछ ही अंतराल पहले बताया गया था कि संबंधित विभाग ने वित्तीय वर्ष 2017-18 में 115.12 करोड़ रुपये के हस्तशिल्प का निर्यात किया।

जम्मू-कश्मीर सीमेंट्स में 2017-18 में निगमों ने 850 मीट्रिक टन सीमेंट उत्पादन के साथ 114.01 करोड़ रुपये का टर्नओवर रहा, सीमेंट का औसत उत्पादन 800 मीट्रिक टन था।

इसके बावजूद कश्मीरी कारीगरों की आय 1980 के दशक से नहीं बढ़ी है। वे प्रतिदिन सौ-डेढ़ सौ रुपये की कमाई करते हैं।

रेशम और सेब का कारोबार

फ़ाइनेंशियल एक्सप्रेस की हालिया रिपोर्ट बताती है कि वित्त वर्ष 18 में जम्मू कश्मीर की प्रति व्यक्ति आय 65,615 रुपये रही, जो राष्ट्रीय औसत लगभग 98 हजार रुपये से नीचे है।

2018-19 के आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार, जेएंडके में अकुशल श्रम के लिए न्यूनतम मजदूरी 225 रुपये प्रतिदिन है।

कश्मीर भारत में सेब के कुल उत्पादन का 70 प्रतिशत योगदान देता है। भारत में कुल सेब उत्पादन लगभग 27.5 लाख मीट्रिक टन है और जम्मू-कश्मीर से 20 लाख मीट्रिक टन उत्पादित किया जाता है।

आधिकारिक रिकॉर्ड के अनुसार, कश्मीर ने 2018 के दौरान 1851723 मीट्रिक टन सेब का उत्पादन किया।

कश्मीर में 146327 लाख हेक्टेयर भूमि पर सेब की खेती की जाती है। ये उत्पादन बिना हजारों मजदूरों के संभव नहीं है। इस उद्योग का गौरवशाली अतीत था, लेकिन वर्षों से लगातार गिरावट में है।

जीवनरेखा कही जाने वाली वुलर झील लगातार सिकुड़ रही है। कश्मीर घाटी के लिए 60 प्रतिशत मछली यहीं से मिलती है और 12 हजार से ज्यादा परिवार इस पर निर्भर हैं।

आंकड़े बताते हैं कि 1997 में 9655 श्रमिक मछली पकडऩे में लगे थे और 25,816 लोग आजीविका के लिए इस उद्योग पर निर्भर थे।

अनुसंधान और बुनियादी ढांचे की कमी ने इस क्षेत्र को विकसित नहीं होने दिया। जम्मू और कश्मीर में निर्यात के लिए उत्तम गुणवत्ता वाले रेशम का उत्पादन कर सकता है।

कश्मीर ने 60 साल पहले इटली और जापान की तुलना में गुणवत्ता और मात्रा में बेहतर रेशम प्रस्तुत किया। इस उद्योग का गौरवशाली अतीत था, लेकिन वर्षों से लगातार गिरावट में है।

वर्ष 1980-81 में 38 हजार परिवार इस काम से जुड़े थे, जो 1999-2000 में 25 हजार के आसपास रह गए। मुख्य कारण सरकारी उदासीनता रही।

कश्मीर में जनता ही नहीं प्राकृतिक संसाधन भी क़ैद में

दरअसल, कश्मीर के प्राकृतिक संसाधन राजनैतिक ‘कैद’ में हैं। किसानों और उनके परिवारों को प्रशिक्षित करने और नई तकनीकों को लाने के लिए कोई प्रयास नहीं किए गए।

सरकार ने काश्तकारों के लिए न्यूनतम दर का आश्वासन भी नहीं दिया, जिससे शहतूत की खेती रामभरोसे हो गई।

वहीं, केंद्र सरकार ने ये कहकर छुटकारा पा लिया कि चीन से महंगा होने के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में कश्मीरी रेशम को बेचना मुश्किल है।

किसान तो अक्सर सुरक्षाबलों और आतंकवादियों के बीच लड़ाई में फंस जाते हैं और मारे जाते हैं। सरकार के राहत पैकेज गुम हो जाते हैं और माहौल की वजह से बैंक से ऋण भी नहीं मिल पाता।

सीमा पर रहने वालों की हालत तो बहुत ही दयनीय है। खेतीबाड़ी, पशुधन, संपत्ति सबकुछ खत्म हो गया गोलीबारी में। कारोबार पर चंद लोगों का कब्जा है।

वे खुदमुख्तारी चाहते हैं कारोबार में, लेकिन श्रमिकों के पसीने का दाम नहीं देना चाहते। इन्हीं में कई अलगाववाद के नेता भी हैं, जो आम कश्मीरी का हक मारकर ‘आजादी’ के आंदोलन को हवा देते हैं।

वे खुदमुख्त्यारी चाहते हैं कारोबार में, लेकिन श्रमिकों के पसीने का दाम नहीं देना चाहते।

बिल्कुल वैसे ही, जैसे भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में तमाम जमींदार और उद्योगपतियों ने अंग्रेजों के खिलाफ आंदोलन में बदहाल मजदूर किसानों को भी लामबंद कर लिया। उनके हक की बारी जब भी आई, वे नजर बचा लेते थे।

(आशीष सक्सेना स्वतंत्र पत्रकार हैं.)

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