पंजाब में दो तिहाई खेतिहर दलित महिला मज़दूर बलात्कार की शिकार

पटियाला की पंजाबी यूनिवर्सिटी के छात्रों द्वारा किए गए सर्वे  में ये बात निकल कर आई है कि पंजाब में महिला खेतिहर मज़दूरों को व्यापक रूप से यौन उत्पीड़न का शिकार होना पड़ता है।ग्रामीण और कृषि अर्थशास्त्र के जानकार प्रफेसर ज्ञान सिंह और उनकी टीम ने पंजाब के 11 जिलों के 1017 घरों से प्राइमरी डेटा इकट्ठा किया है।

अप्रैल 2019 में जारी किए गए उनके विश्लेषण के मुताबिक यहां काम करने वाली 70 प्रतिशत महिलाओं ने माना है कि उनका यौन शोषण हुआ।

लेकिन वे इस बारे में चुप थीं। इनमें से कई को जातिगत भेदभाव की वजह से उत्पीड़न झेलना पड़ा।

इन खेतों में काम करने वाली 92 प्रतिशत महिलाएं दलित हैं। एक अनुमान के मुताबिक पंजाब में 15 लाख मजदूर खेतों में काम करते हैं।

कर्ज का बोझ दबी है लगभग मजबूर सभी महिलाये

सामाजिक और आर्थिक वजहों से दंश झेलने को मजबूर महिला में लगभग सभी कर्ज का बोझ से दबी है।

अपने साथ हो रही ज्यादती का वे इसलिए विरोध नहीं कर पा रही हैं, क्योंकि उन्हें अपनी मजदूरी छिनने का डर बना रहता है ।

यहां तक कि उन्हें बहुत कम मजदूरी में भी वे काम करने को मजबूर हैं।

वो डरती है अगर वो मालिकों के खिलाफ बोलेगी तो उन्हें फिर काम कौन देगा ।

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फ़ोटो साभारःhindustantimes
बुनियादी जरूरतें  भी पूरी  नहीं होती

प्रफेसर ज्ञान सिंह के मुताबिक पंजाब में एक ग्रामीण महिला मजदूर सालाना औसतन 77,198 रुपये कमाती है।

रोजमर्रा की जिंदगी में बुनियादी जरूरतें पूरी करने के लिए यह रकम काफी कम है।

ज्यादातर परिवारों को अंत में कर्ज लेना पड़ता है। पर कर्ज की रकम बहुत ज्यादा नहीं होती है।

लेकिन साहूकार (कर्ज देने वाले) बहुत ज्यादा ब्याज लगाते हैं। जिससे उन्हें कर्ज चुकाने में काफी मुश्किल होती है।

कम मजदूरी में भी हाड़तोड़ मेहनत को मज़बूर

प्रफेसर सिंह का कहना है कि उनके अध्ययन में शामिल 93.71 प्रतिशत महिला मजदूरों पर कर्ज है

औसतन एक परिवार पर 53,916 रुपये का कर्ज है।

कुल कर्ज में से 81 प्रतिशत गैर संस्थागत स्थानीय साहूकारों से लिया जाता है।

स्टडी में शामिल 90 प्रतिशत को मानकों के मुताबिक मजदूरी के काम के घंटों और न्यूनतम मजदूरी के बारे में नहीं पता था।

36 प्रतिशत से ज्यादा महिला मजदूरों को पुरुषों जितनी मजदूरी नहीं मिलती है।

मज़दूरी खोने डर बना रहता है

एक महिला मजदूर कहती हैं, ‘सुबह 8 बजे काम शुरू होता है और दोपहर के भोजन तक कोई ब्रेक नहीं मिलता है। हम ज्यादा से ज्यादा काम खत्म करने की कोशिश करते हैं चूंकि हमें एक काम पूरा करने के लिए दिया जाता है। हमें रोजमर्रा के आधार पर काम नहीं मिलता है।’

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फ़ोटो साभार :HarvestPlus
बच्चे शिक्षा हासिल करने से वंचित

पिछले एक दशक के दौरान कर्ज लेने वालों की तादाद बढ़ रही है क्योंकि खेती अब मशीनों पर निर्भर हो गई है।

रोजगार में कमी की वजह से आर्थिक संकट बढ़ रहा है। और सरकार का रवैया खेतिहर मज़दूर को लेकर उदासीन है

गरीब परिवार अब जहां भी काम मिलता है, वहां पलायन कर रहे हैं। इससे उनके बच्चे शिक्षा हासिल करने से वंचित रह जाते हैं।

(ये ख़बर नवभारत टाइम्स में प्रकाशित हुई है, जिसे हम संपादित कर वर्कर्स यूनिटी के लिए दे रहे हैं. सं.)

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