इतिहास के झरोखे से-8 : जब ज्योति बसु के नेतृत्व में एटक से अलग सीटू की नींव रखी गई

By सुकोमल सेन

(‘इतिहास के झरोखे से’, यानी लेखों की एक ऐसी शृंखला जिसमें मज़दूर आंदोलन के इतिहास का कोई पन्ना हमारे सामने खुलेगा। आज पढ़िए आठवीं कड़ी में सेंटर ऑफ ट्रेड यूनियन का अविर्भाव कैसे हुआ?)

एटक की कार्यसमिति के कुछ सदस्य और राज्य समिति के सदस्य, जो प्रभावशाली नेतृत्व के वर्ग समझौतावादी नीतिगत निर्णय के विरोधी थे, उन्होंने 9-10 अप्रैल 1970 को गोवा में एक सम्मेलन किया।

इस सम्मेलन में, भारतीय मजदूरों के नए संघर्षशील केन्द्र के निर्माण के लिए एक ऑल इंडिया ट्रेड यूनियन सम्मेलन आयोजित करने का निर्णय हुआ।

तदनुसार एक स्वागत समिति का गठन हुआ। ज्योति बसु को इस समिति का अध्यक्ष और मनोरंजन राय को महासचिव चुना गया।

इसके बाद 28-30 मई 1970 को कोलकाता के रंजीत स्टेडियम (लेनिन नगर) में एक ऑल इंडिया ट्रेड यूनियन्स सम्मेलन संपन्न हुआ।

ज्योति बसु ने अपने स्वागत भाषण में, भारत के जुझारू मजदूरों को संगठित करने के लिए एक अलग राष्ट्रीय केंद्र और संगठन की ऐतिहासिक आवश्यकता पर बल दिया।

jyoti basu @cpim

एटक से शिकायत

उन्होंने कहा कि हम सब आज यहां पर देश के कोने-कोने से अपने देश के मजदूर वर्ग और ट्रेड यूनियन आंदोलन के भविष्य के संबंध में अत्याधिक महत्वपूर्ण निर्णय होगा।

भारत में अनेक ट्रेड यूनियन केन्द्र होने के बावजूद एक नए केन्द्र का निर्माण एक फूट डालने वाली कार्रवाई मालूम पड़ सकती है।

लेकिन दूसरी तरफ भारत के जूझारू समंघर्षशील मजदूर वर्ग के एकत्र होने के लिए ऐसा केंद्र आज की ऐतिहासिक आवश्यकता है।

हम सब लोगों ने मिलकर और अनेक कामरेडों के बलिदान के बल पर एटक का निर्माण किया।

आज वह संगठन पूंजीपतियों के आगे आत्मसमर्पण करने वाले और जुझारू मजदूर आंदोलन की टांग खींचने वाले संगठन में रूपांतरित हो गया है।

सुधारवादियों ने गैर जनवादी तरीकों से एटक के नेतृत्व पर कब्जा जमा लिया है और उन यूनियनों को जिन पर उनका नियंत्रण नहीं हैं संगठन से बाहर रखा गया है।

एटक पर शासक वर्ग का पिछलग्गू होने का आरोप

सुधारवादी ट्रेड यूनियन केंद्रों और नेताओं ने सदा ही ट्रेड यूनियन आंदोलन को आर्थिक संघर्षों की सीमाओं में बांधे रखने का प्रयास किया है।

आज एटक का संशोधनवादी नेतृत्व भी उसी मार्ग पर चल रहा है। एटक के संशोधनवादी नेतृत्व ने मजदूर वर्ग का दृष्टिकोण और राजनीति छोड़ दी है।

वह मजदूर वर्ग को जुझारू मजदूर आंदोलन या शासकवर्ग के खिलाफ राजनीतिक संघर्ष के लिए कभी तैयार नहीं कर सकता।

यदि कोई ट्रेड यूनियन एक बार अपने उद्देश्य से विमुख हो जाती है तो वह शासक वर्ग की पिछलग्गू हो जाती है।

एटक का नेतृत्व प्रतिदिन और हर पल मजदूर वर्ग को वर्ग सहयोग की राजनीति की घुट्टी पिलाने और पूँजीपतियों का नेतृत्व स्वीकार कराने का प्रयास कर रहा है।

नई ट्रेड यूनियन बनाने पर ज़ोर

उन्होंने कहा कि एटक के नेतृत्व द्वारा युद्ध विरोधी समझौते के बारे में निजी संस्थानों में निभाई गई भूमिका की चर्चा करते हुए सरकार द्वारा नियुक्त त्रिपक्षीय समितियों और अन्य समितियों में उनकी विश्वासघाती भूमिका निभाने का उदाहरण पेश किया.

बोनस आयोग में डांगे की व्यक्तिगत कार्यक्षमता से लेकर राष्ट्रीय श्रम आयोग द्वारा अध्ययन ग्रुपों के लिए नियुक्त विभिन्न नेताओं द्वारा मजदूर वर्ग को अंतराष्ट्रीय चेतना से परे रखने के प्रयासों के बारे में अपनी बात समाप्त करते हुए ज्योति बसु ने कहा-

इस परिस्थिति में हमको एक सच्चे जनवादी और क्रांतिकारी ट्रेड यूनियन केंद्र के निर्माण के लिए बाध्य कर दिया है।

एक ऐसा केंद्र जो मजदूर वर्ग के जुझारू आर्थिक संघर्षों का संचालन करने के साथ राज्यसत्ता प्राप्ति के लिए उनका राजनीतिकरण करे और दुनिया के तमाम देशों में चल रहे साम्राज्यवाद विरोधी संघर्ष का सामना करे।

सम्मेलन में पी. राममूर्ति द्वारा मुख्य रिपोर्ट प्रस्तुत करते हुए कहा गया कि एकता के प्रयासों और संघर्षों को संचालित करने के लिए भी इस नए अखिल भारतीय केंद्र का निर्माण करना आनश्यक है।

मज़दूरों को एक यूनियन में संगठित करने का तर्क

उन्होंने जोर देकर कहा कि ट्रेड यूनियन आंदोलन में जमीनी स्तर पर एकता के प्रयास पूरे उत्साह के साथ चलाए जाने चाहिए।

पी. राममूर्ति ने अपनी रिपोर्ट में घोषित किया कि हम एक फैक्टरी या उद्योग में एक यूनियन के पक्ष में हैं। हम राजनीतिक संबद्धता के आधार पर ट्रेड यूनियन में विभाजन नहीं चाहते।

हम मजदूरों को एक यूनियन में एकताबद्ध करना चाहते हैं क्योंकि मालिकों के खिलाफ मजदूरों के हित समान हैं और उनको एकताबद्ध होकर संघर्ष संचालित करना होगा।

सम्मेलन में डॉ. एम. के. पंधे द्वारा प्रस्तुत प्रत्यय पत्र समिति (क्रेंडेंशियल कमेटी) की रिपोर्ट से पता चलता है कि सम्मेलन में भारी तादाद में मजदूर वर्ग की भागीदारी हुई।

कुल 8,04,637 सदस्य संख्यावाली 1,759 यूनियनों ने 4,264 प्रतिनिधियों को सम्मेलन में भागीदारी के लिए भेजा, विदेशों से 116 प्रतिनिधियों और अन्य मित्र फेडरेशनों से 1,134 प्रतिनिधियों ने भागीदारी की।

सम्मेलन में राष्ट्रीय और अंतराष्ट्रीय प्रश्नों पर कई प्रस्ताव पारित किए गए। सम्मेलन की कार्रवाई का सारसंक्षेप प्रस्तुत करते हुए बी. टी. रणदिवे ने एक जुझारू ट्रेड यूनियनों केंद्र की आवश्यकता बताते हुए राष्ट्रीय, अंतराष्ट्रीय परिस्थिति की विस्तृत चर्चा की।

रणदिवे का भाषण

रणदिवे ने भारतीय ट्रेड यूनियन आंदोलन के कार्यभार को स्पष्ट रूप से रेखांकित करते हुए कहा कि ट्रेड यूनियन आंदोलन को यह नहीं भूलना चाहिए कि अगर मजदूर वर्ग सचेत रूप से सत्ता पर कब्जा करने का प्रयास नहीं करता तो समाजवाद और शोषण से मुक्ति केवल शब्द ही रह जाएंगे।

आगे उन्होने कहा कि पूंजीपतियों और भूस्वामियों की वर्तमान सरकार को हटाकर जनता की सच्ची सरकार की स्थापना करना है ।

वर्तमान सरकार को बदलने के लिए, किसानों के साथ मिलकर जनवादी संघर्षों की अगुवाई करना और उनमें भागीदारी करना, कृषि क्रांति के लिए पूर्ण सहयोग प्रदान करना ज़रूरी है।

इसके लिए तमाम जनवादी शक्तियों का संयुक्त मोर्चा निर्मित करना, करने का सतत प्रयास करना होगा। आज सभी ट्रेड यूनियन आंदोलनों का यही मुख्य कार्यभार है।

10 लाख मज़दूरों के साथ सीटू का गठन

सम्मेलन का समापन 31 मई 1970 को कोलकाता के बिग्रेड परेड मैदान में खुले सत्र के रूप में बी. टी. रणदिवे की अध्यक्षता में हुआ।

इस सभा में लगभग 10 लाख मजदूरों और आम जनता ने पूर्ण उत्साह के साथ भागीदीरी की।

नव गठित संगठन सेंटर ऑफ इंडियन ट्रेड यूनियन्स (सीटू) के अध्यक्ष के रूप में बी.टी रणदिवे और पी. राममूर्ति को महासचिव चुना गया।

तब से भारतीय जनता के जीवन में राजनीतिक परिदृश्य पर गंभीर महत्व के परिवर्तन का सिलसिला जारी है और भारतीय मजदूर वर्ग की कार्रवाइयों ने भी सारे पुराने रिकार्ड तोड़ दिए हैं।

(सुकोमल सेन की किताब ‘भारतीय मज़दूर वर्गः उद्भव और आंदोेलन का इतिहास’ से साभार। टंकण- शोभा मेहता)

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