कश्मीरी जनता के दमन का मज़दूर वर्ग को क्यों विरोध करना चाहिए?

By श्यामबीर शुक्ला

आज जब पूरे देश में मंदी का असर गहरा गया है. बड़े पैमाने पर नौकरियां जा रही हैं, तालाबंदी और दिवालिया होने वाली निजी और सरकारी कंपनियों का तांता लग गया है, ऐसे में सत्तारूढ़ बीजेपी सरकार कश्मीर को सुलगाकर अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकने पर तुली हुई है।

मोदी सरकार और उसका पैतृक संगठन राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (आरएसएस) को न तो कश्मीर की जनता से मतलब है न बाकी देश की जनता से।

अपने राजनीतिक एजेंडे को पूरा करने के लिए ही बीजेपी ने अनुच्छेद 370 और 35 ए को हटाया है।

ऐसे में जो मज़दूर वर्ग है उसे कश्मीर की जनता पर हो रहे इस दमन और आत्म निर्णय के अधिकार के हनन का पुरज़ोर विरोध करना चाहिए।

पिछले कुछ दिनों से भारत सरकार ने जम्मू कश्मीर को जबरदस्त सैन्य छावनी बना दिया है।

अभी मोदी सरकार-2 के आने के बाद पिछले एक पखवाड़े से इन्होंने एक पैनिक माहौल बनाया और पूरे जम्मू कश्मीर को सैन्य छावनी से आगे ले जाकर जेल बना दिया है।

यहां तक कि इंटरनेट सेवाएं बंद कर दीं, मुख्य धारा के शीर्ष नेताओं को नज़रबंद कर दिया है, मीडिया की आज़ादी को और ख़त्म कर दिया है, ज़रूरी सेवाओं को छोड़ सब ठप कर दिया और धारा 144 लागू कर दी है, वो ख़तरनाक है।

एक उम्मीद का ख़त्म होना

और इस मुद्दे को कार्पोरेट और सरकार परस्त मीडिया ने इस मुद्दे को कश्मीर में प्लाट ले पाने के अधिकार का मुद्दा बना दिया है।

बिना ये सोचे कि वहां कौन प्लॉट ख़रीदेगा, कौन जाकर रहेगा।

सबसे अहम बात ये है कि मोदी शाह सरकार ने इस पूरे मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय मुद्दा बनाने के लिए खुली छूट दे दी है।

इसमें सम्राज्यवादियों को हस्तक्षेप करने का मौका मिलेगा, नतीजन इस पूरे इलाक़े का और सैन्यीकरण होना तय लगता है।

ऐसे में कश्मीर की मेहनतकश और मज़दूर जनता को ही इन सबका नतीजा भुगतना पड़ेगा।

कश्मीर का राज्य का दर्ज़ा भी छीन लेने से अब वहां दमन के ख़िलाफ़ उठती आवाज़ और दबेगी।

सैन्य ज्यादातियों के ख़िलाफ़ जो थोड़ी बहुत न्याय की उम्मीद राज्य सरकार से की जाती थी, उसकी उम्मीद भी ख़त्म हो गई है।

जब हम दुनिया के मज़दूरों एक हो का नारा देते हैं तो हम समझते हैं कि उसमें कश्मीर का मज़दूर वर्ग भी शामिल है।

इसलिए मज़दूर वर्ग को साशक वर्ग के हमले की निंदा करनी चाहिए और उसके ख़िलाफ़ कश्मीरी जनता के साथ मज़बूती से खड़ा होना चाहिए।

kashmir worker

कश्मीरी मज़दूर वर्ग पर असर

मज़दूर वर्ग की राजनीति यही कहती है कि कश्मीर ही नहीं किसी भी देश, प्रदेश के भविष्य का निर्णय वहां की जनता ही कर सकती है और इसलिए जम्मू कश्मीर की जनता को भी अपना मुस्तकबिल तय करने का अधिकार होना चाहिए।

देश की अखंडता और एकता के नाम पर जनता का कत्लेआम करना मज़दूर वर्ग सहन नहीं कर सकता।

भारत सरकार ने जो किया है आखिरकार उसका असर प्रदेश की मेहनतकश जनता और समूचे मज़दूर वर्ग पर पड़ेगा क्योंकि ऐसे हालात में उद्योग धंधे और कारोबार धाराशायी हो जाएंगे।

ऐसे में मेहनतकश जनता के पास बड़े पैमाने पर वहां से पलायन करने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचेगा।

दूसरी तरफ़ भगवा ब्रिगेड ने पूरे देश में जम्मू कश्मीर की मेहनतकश जनता के ख़िलाफ़ जो माहौल बना रखा है, उसमें कश्मीरी मज़दूरों के लिए और कठिन समय आने वाला है।

अभी पिछले पुलवामा की घटना के बाद जिस तरह पूरे देश में कश्मीरी वर्कर जो देश के अन्य हिस्सों में काम कर रहे थे, उऩ्हें सार्वजनिक रूप से पीटा गया।

उन्हें जबरदस्ती वापस जाने पर मजबूर किया गया, उससे भगवा ब्रिगेड के इरादे बिल्कुल साफ़ हो चुके हैं।

(फ़ोन पर बातचीत पर आधारित। श्यामबीर शुक्ला इंकलाबी मज़दूर केंद्र के नेता हैं और मज़दूर वर्ग के बीच लंबे समय से सक्रिय हैं।)

(वर्कर्स यूनिटी स्वतंत्र निष्पक्ष मीडिया के उसूलों को मानता है। आप इसके फ़ेसबुकट्विटर और यूट्यूब को फॉलो कर इसे और मजबूत बना सकते हैं।)

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