एक मामूली ऑपरेशन बिना मर गया मेरा एक मज़दूर साथी

(चंद्रा की कविताएं किसी भट्टी से निकले तपते हुए लोहे जैसी हैं। इनमें दुखः, क्षोभ, आक्रोश और वो सारी संवेदनाएं देखने को मिलती हैं  जो मज़दूर-किसान महसूस करता है, लेकिन व्यक्त नहीं कर पाता। उनकी कविताओं में एक आह्वान है जो उन्हें उन्हें अलग पहचान देता है। जन्म- 21 अप्रैल  1997, खेरनी काछारी गांव, ज़िला- कार्बी आंगलोंग, असम। पेशा- खेती, मज़दूरी। सं.)  

मेरा एक मज़दूर साथी

एक मामूली ऑपरेशन बिना मर गया
मेरा एक मज़दूर साथी

ओह ! उसकी आत्मा पत्थर-घाट के श्मशान में
रोती है आज

उसकी कही हुई बातें

मेरी छाती की बाती-बाती में
बार-बार चोट करती हैं

खेतों में कुदाल चलाते समय जब
मुझसे कहता था कि मोहन भाई
दुनिया के किसी भी घर में रहो
पर याद रखना
कि यहाँ कोई पानी भी नहीं देगा
माँगने पर

बिना तने हुए हाथों के
एक फूल भी टूट नहीं सकता

हज़ार शिशों से कटने का खतरा उठाए बिना
एक सुन्दर जीवन गढ़ नहीं सकता
आगे बढ़ ही नहीं सकता दोस्त

अपनी पगड़ी में गाँठ बाँधकर याद रखना
बिना हाड़-तोड़ मिहनत-मज़दूरी किए
कहीं भी धकेले जाओगे

जीने में लज्ज़त एक पैसा का न रह जाएगी
आँसू चुपचाप बहाते जाओगे

तुम्हारे घरवाले क्या
एक पूरा देश भी कदर नहीं करेगा
तुम्हारे लहू-पसीने की

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रास्ते हम ही ने बनाए

देश एक रास्ता है
और रास्ते के बीच जितने गहरे गड्ढे हैं
लगभग सब के सब गद्दार हैं
और हम देश के रास्ते पर चलते हुए
गिर जाते हैं बार-बार
गड्ढे में

यह हमारी जीत नहीं
बड़ी हार है,
बड़ी हार
कि रास्ते हम ही ने बनाए

poem by chandra
यह बात इस देश के राजा को मालूम नहीं!

सुबह का सूरज लगभग उग चुका है

देश का काला कौवा विमानों से विदेशों में उड़ चुका है
सुबह की हवाएँ लगभग शांत हैं

मजदूर रामकैलाश चाचा के भूखे बच्चे
आज दो दिनों से अमरूद खा कर किसी किसी तरह जी
और कपिली का जल पी रहें हैं

दूर, बहुत दूर से आ रही है
मेरे मरे हुए यार के घर से
स्त्रियों की रोने की दारुण आवाजें

लगभग चीख और चुप्पियों से भरी हुई है
खेतों के पालनहारों की आत्माएँ

सुबह की देशी -परदेशी चिड़ियाएँ
लगभग उदास हैं

खुंटियों में बंधाये हुये गाय बैल बकरीयाँ
भूख के कस के खुरचने पर पगहा कभी भी
तुड़़ा सकते हैं

और आन के खेतों में या वन-जंगलों में आज़ाद चर सकते हैं
खेतियों के भविष्य के बारे में सोचते पिता
खेत के मेड़ पर बैठे हैं

उनकी बाँस की सूखी पत्तियों की तरह आत्मा
कब अब गिर जाए

काल-जल के अतल-नदी में
यह बात इस देश के राजा को मालूम नहीं

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अभी बस अभी…

अभी थोड़ी देर पहले इस जिले में आतंकवादी हमला हुआ
भीड़ में कुचली गई अभी एक मज़दूर की ज़िंदगी

अभी थोड़ी देर पहले देश और नागरिकता को लेकर जोरदार धरती और आसमानी धमाका हुआ
अभी थोड़ी देर पहले 19 लाख लोग से अधिक एनआरसी लिस्ट से बाहर कर दिए गए

एनआरसी लिस्ट से बाहर हुए लोग कहने लगे कि नागरिकता क्यों नहीं मिली
और क्यों न मिलेगी हमें?

नागरिकता नहीं मिलेगी तो लड़ेंगे
चाहे कटेंगे या मरेंगे

इस आवाज पर एक सरकारी हरामजादे ने
कहा कि-  तुम लोग बांग्लादेशी हो
तुम सब एनआरसी लिस्ट से बाहर कर दिए गए
केवल फुटपाती हो

तुम सब का नाम इस राज्य के नक्शे से बाहर कर दिया गया है
तुम सबका यह राज्य नहीं
यह देश नहीं..

फिर उसने कहा कि-
लड़ो! लड़ो! कटो !कटो! मरो! मरो..
जैसे चाहिए वैसे नागरिकता साबित करो..’

कि अभी बस अभी एक बच्चे ने भात-भात रटते हुए दम तोड़ दिया
पुलिस के सामने अभी एक पुलिस ने मेरी अनपढ़ माँ को कुत्ते जैसे दुत्तकारा

अभी बस अभी एक किसान की पगड़ी उछाली गई दूर खेतों में
मैंने आँखों से देखा अभी कि
चलती हुई ट्रेन से एक टीटी ने
बिना टिकट के जाते हुए चाय बागान के मज़दूर को फेंक दिया

अभी बस अभी एक कट्टर हिंदू-पशु ने
देश के तिरंगे पर गू-मूत कर चला गया

लहराते हुए गन्ने के खेतों के बीच शौच करने जाती हुई मेरी बहन को अभी कुछ दरिंदों ने
धर-दबोच कर मारा और ज़मीन में गाड़ा
अभी बस अभी कुछ दोगले ज़मींदारों ने मेरी कमज़ोरी का फ़ायदा उठाया

अभी बस अभी मैं कविता ही लिख रहा था
एक कम्युनिस्ट किताब ही पढ़ रहा था
कि एक मनुष्यता और देश का हत्यारा कुत्ता की तरह सनक रहा था

कह रहा था कि कविता लिखना छोड़ दो
और कम्युनिस्ट किताबें पढ़ना छोड़ दो

वरना जेल जाओगे
और गरम मसाले की तरह पीसे जाओगे

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थोड़ी सी सुन्दर पृथ्वी के लिए

यदि मुझमें नहीं है तनिक भी प्यार
यदि मैं आदमी नहीं हूँ मिलनसार
यदि मैं सीख नहीं सकता तनिक भी ज्ञान
यदि मैं लिख नहीं सकता अपनी लोक भाषा में मधुर गान
यदि मैं पढ़ नहीं सकता और कवियों की कविताएँ
यदि मैं अपने श्रम का लहू बहाकर
इस धरती पर उपजा नहीं सकता अनाज
यदि मैं इस धरती पर रोप नहीं सकता एक भी पेड़ का बीज
यदि मैं पीड़ितों की पीड़ाएँ देख
नहीं सकता भीतर बाहर पसीज
यदि मैं दुनिया के अनाथ और मासूम मासूम
बच्चे बच्चियों के होठों पर नहीं सकता चूम
और नहीं दे सकता यदि इन्हें दो जून की रोटी औ’ नून

यदि मैं थोड़ी सी दुनिया में
अपने पैरों पर खड़ा हो कर नहीं सकता घूम
यदि मैं अपने जीवन में कभी भी न करूँ दान पुण्य

यदि मैं बचा नहीं सकता चिड़ियों के सुन्दर घोंसलों के लिए
घास फूस का घर
यदि मैं बचा नहीं सकता नदी पर्वत झील सरोवर और विश्व पर्यावरण

यदि मैं सिर्फ अपने ही दुखों को दुख कहूँ ,समझूँ
और औरों के दुखों पर दूँ लात मार

यदि मेरे जीने से पृथ्वी भी धीरे धीरे मरने लगे

तो मुझे ही मर जाना चाहिए
मर जाना चाहिए मेरे भाई
थोड़ी सी सुन्दर पृथ्वी के लिए
मुझे ही मर जाना चाहिए

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2 thoughts on “एक मामूली ऑपरेशन बिना मर गया मेरा एक मज़दूर साथी

  • October 5, 2019 at 8:55 am
    Permalink

    भयावह सच को बिना लाग लपेट के सामने रखती ये कविताएँ झकझोरती हैं..
    भोगे हुए दर्द और गहरी पीड़ा को प्रकट करती ये कविताएँ पाठक को गहरे संवेदित करती है..
    इन कविताओं का चयन करने एवं प्रकाशित करने के लिए संपादक महोदय क्षको साधुवाद।

    Reply
  • October 7, 2019 at 1:08 am
    Permalink

    शानदार! बधाई

    Reply

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