होंडा में चल रहे गतिरोध का सीधा असर उसकी क्वालिटी पर पड़ रहा है

गुडगांव के मानेसर में होंडा मज़दूरों को विरोध प्रर्दशन करते हुए 28 दिन हो चुके हैं बावजूद इसके प्रशासन की मनमानी कम होने का नाम नहीं ले रही है।

लंबे विरोध प्रर्दशन और बाइक रैली जैसे बड़े-बड़े विरोधों के बाद भी, अब तक मज़दूरों की मांगों को लेकर किसी भी तरह का फैसला नहीं लिया गया है।

वर्कर्स यूनिटी से होंडा के एक मज़दूरों ने फोन पर बातचीत के दौरान होंडा से जुड़े ताजें मामलों के बारे में बताते हुए कहा कि गुडगांव के एसडीएम ने ढाई हज़ार कैजुअल मज़दूरों को होंडा से निकाले जाने के मामले पर संज्ञान लेते हुए मज़दूरों को ये आश्वासन दिया गया की एक से दो दिन में इस मामले को लेकर हल निकाल लिया जाएगा।

लेकिन अभी तक मामले को लेकर किसी भी तरह का फैसला नहीं हो पाया है, वो आगे बतातें हैं कि अभी जो परमानेंट मज़दूर कंपनी के अंदर काम कर रहे हैं प्रशासन ने उनके ऊपर भी मनमानी की गाज गिरानी शुरू कर दी है।

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होंडा प्रशासन और परमानेंट मज़दूरों  में गतिरोध 

उनका कहना है कि प्रशासन मज़दूरों के बीच गतिरोध पैदा करने कि कोशिश कर रहा है, जो मज़दूर किसी और डिपार्टमेंट में काम करने में एक्सपर्ट है उन्हें उस डिपार्टमेंट से निकालकर अलग डिपार्टमेंट में काम करने के लिए मजबूर किया जा रहा है वो भी तब जब वो मज़दूर उस काम का जानकार नहीं है।

उदाहरण के तौर पर कंपनी में टेक्निकल काम करने वाले मज़दूरों को जबरन लाइन के काम में लगाया जा रहा है।

उनका आरोप है कि काम को लेकर मज़दूरों पर दवाब बनाया जा रहा है और मज़दूरों से अंडरटेकिंग भरवा कर कंपनी मज़दूरों को जबरन वो काम करने पर मजबूर कर रही है जिसके वो जानकार नहीं हैं।

ताकि बाद में इन पर ये इलजाम लगाया जा सके की कंपनी के अंदर काम नहीं हो रहा है और इसी बहाने उनको कंपनी से बाहर निकाल दिया जाए।

इसी मामले पर सवाल उठाते हुए होंडा के परमानेंट मज़दूरों ने कंपनी प्रबंधन से ये अपील की है कि उनका डिपार्टमेंट बदल कर क्यों उनकों ऐसे डिपार्टमेंट में तैनात किया जा रहा है जिसकी जानकारी उनको नहीं है और अगर कंपनी ये जानकर कर रही है तो उनको लिख कर दें कि वो ऐसा क्यों करवा रहें हैं।

नया काम सीखने के लिए 1 हफ्ते का समय

उनका कहना है कि कंपनी में अभी काम नहीं चल रहा बल्कि कंपनी के द्रारा मज़दूरों को नया काम सिखाने के लिए 1 हफ्ते का समय दिया गया है।

ऐसे में मज़दूरों का कहना है कि उनके साथ ये सरासर गलत है इस तरह से 1 हफ्ते में नई तकनीक सीखना कोई आम बात नहीं है।

लिहाजा कंपनी जान कर मज़दूरों के साथ साजिश कर रही है, और उनका कहना है कि इस मामले को लेकर होंडा यूनियन के प्रधान सुरेश गौंड के समर्थन पर अंडरटेकिंग भरा गया था।

वो आगे बताते है कि कंपनी मनमाने ढंग से स्कूटर प्लांट को बंद कर मज़दूरों को बाइक प्लांट में शिफ्ट कर रही है जिसके वो जानकार भी नहीं है इससे न सिर्फ मज़दूरों के काम पर असर पड़ेगा बल्कि होंडा कंपनी के क्वालिटी पर इसका सबसे ज्यादा असर पड़ेगा।

कंपनी में अफरा-तफरी का असर क्वालिटी पर 

जिस तरह कंपनी मज़दूरों में अफरा-तफरी का माहौल पैदा कर रही है उसका सीधा असर होंडा कंपनी क्वालिटी पर पड़ रहा है।

कंपनी के इस फेरबदल के चलते होंडा की क्वालिटी अब वैसी नहीं रहेगी जैसी हुआ करती थी।

उनका कहना है कि कैजुअल मज़दूरों को कंपनी बाहर का रास्ता दिखा चुकी है जबकि कंपनी में कैजुअल मज़दूर ही काम करते थें परमानेंट मज़दूर केवल उनका समर्थन करते थें।

अब 15 साल के बाद उनकों वो काम करना पड़ रहा है जो उन्होंनें इतने समय से किया ही नहीं था।

इसके अलावा एटक के मज़दूर नेता अनिल पवार ने कहा कि होंडा मामले में मज़दूरों के बाहर निकलने के बाद वार्ता रुक सी गई है और कोई प्रगति नहीं है।

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उन्होंने कहा कि आठ जनवरी को राष्ट्रव्यापी आम हड़ताल की तैयारी जारी और इस बार की हड़ताल उम्मीद से अधिक सफल होगी।

उन्होंने कहा कि तीन दिसम्बर को मानेसर और गुड़गांव में मानव शृंखला बनाई जाएगी और छह दिसम्बर को एक बड़ा सम्मेलन किया जाएगा।

लेकिन इस बात को जरा भी नज़र अंदाज नहीं किया जा सकता कि होंडा के मज़दूरों ने लाखों परेशानियों के बाद भी अपनी मांगों को लेकर आंदोलनरत है

जिसे देखते हुए कई कंपनियां के मज़दूर भी होंडा कंपनी के समर्थन में मैदान में आ गए हैं।

साथ ही होंडा के संघर्ष में जामिया मिल्लिया इस्लामिया कॉलेज के छात्रों नें भी होंडा के मज़दूरों का समर्थन और सहायता करने का आश्वासन दिया है।

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