सिंगरेनी की कोयला खदानों में मुकम्मल हड़ताल और लगातार संघर्ष जारी 

कोलकाता, 24 सितंबर (भाषा) कोयला क्षेत्र के मज़दूर यूनियन  उनकी एक दिन की हड़ताल से कोल इंडिया लिमिटेड और सिंगरेनी कोलियरीज कंपनी लिमिटेड की खदानों में काम पूरी तरह से ठप हो गया हैं ।

विदेशी कंपनियों का विरोध

इस हडताल से  इन खदानों में कोयले का उत्पादन और ढुलाई पूरी तरह बंद हैं।

मज़दूर संगठन कोयला निकासी क्षेत्र में विदेशी कंपनियों को अपने पूर्ण स्वामित्व में कारोबार की अनुमति देने की नीति का विरोध कर रहे हैं।

उनकी मांग है, कि सरकार यह फैसला वापस ले।

हड़ताल का आयोजन सरकारी क्षेत्र की इन दोनों कोयला कंपनियों में सक्रिय श्रम संघों के पांच महासंघों ने किया हैं।

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कोयला खानों में उत्पादन पूरी तरह बंद

इस हड़ताल का आह्वान इंडियन नेशनल माइन वर्कर्स फेडरेशन (इंटक), हिंद खदान मजदूर फेडरेशन (एमएमएस), इंडियन माइनवर्कर्स फेडरेशन (एटक), आल इंडिया कोल वर्कर्स फेडरेशन (सीटू) और आल इंडिया सेंट्रल कौंसिल आफ ट्रेड यूनियन्स (एआईसीसीटीयू) ने मिल कर किया हैं।

कुल पांच लाख से अधिक कोयला श्रमिक इनके सदस्य हैं।

एआईसीडब्ल्यूएफ के महासचिव डी.डी. और रामनंदन ने पीटीआई-भाषा को बताया की ,‘‘ हड़ताल से सभी कोयला खानों में उत्पादन पूरी तरह बंद है और वहां से कोयले की लदाई और निकासी भी बंद हैं।’

देश के कोयला उत्पादन में कोल इंडिया का 80 प्रतिशत योगदान हैं।

हड़ताल के कारण इस कंपनी को एक दिन में 15 लाख टन कोयला उत्पादन का नुकसान होने का अुनमान हैं।

कंपनी के अधिकारी हड़ताल के बारे में कोई टिप्पणी करने को उपलब्ध नहीं थे।

इस हड़ताल का इंटक, एमएमएस, एटक,सीटू और  एआईसीसीटीयू ने मिल कर किया हैं।

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संघ के मज़दूर संगठन बीएसएस ने किया हड़ताल से किनारा

राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ से सम्बद्ध श्रमिक संगठन भारतीय मजदूर संघ (बीएसएस) उपरोक्स संगठनों की हड़तल से अलग हैं।

वह इसी मुद्दे पर सोमवार से 27 सितंबर तक पांच दिन तक कोयला क्षेत्र काम बंद हड़ताल पर हैं।

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मुनाफा बढ़ा पर मज़दूर घटा

हालात की भयावहता को ऐसे समझा जा सकता है कि 1991 में सिंगरेनी कोयला खदान में लगभग 1 लाख 70 हजार मज़दूर काम करते थे, जिनकी संख्या घटकर वर्ष 2018 में मात्र 48 हजार रह गई।

यहाँ करीब 30 हजार मज़दूर ठेकेदारी में काम कर रहे हैं।

यहाँ का बजट 32000 करोड़ रुपये है। इसका आधा हिस्सा इनकम टैक्स विभाग और केंद्र व राज्य सरकारों के हिस्से जाता हैं।

जबकि 50 फीसदी निजी ठेकेदारों के पास चला जाता है। 2018 में ठेकेदारों का मुनाफा 1,200 करोड़ रुपये था।

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नई भर्ती पर रोक

1991 में भूमिगत खदानों की संख्या 54 थी। नव उदारवादी नीतियों के कारण 2018 में 29 रह गईं।

इनकी जगह पर ऊपरी खदानों (ओवर ग्राउंड माइन्स) पर जोर बढ़ता गया।

5 ऊपरी खदानों से शुरू होकर इनकी संख्या आज 30 तक जा पहुँची हैं।

यही नहीं, 13 और खुली खदानों के लिए सरकार के पास प्रस्ताव भेजा जा चुका है। इसी के साथ सिंगरेनी में नई भर्ती पर रोक लगा दी गई।

जो स्थाई मज़दूर रिटायर हो रहे हैं उनकी जगह पर ठेका प्रक्रिया में भर्ती की जा रही है।

खुली खदानों के लिए कम से कम 2 या 3 हजार एकड़ आदिवासी जमीन को लिया जा रहा है।

इसके लिए भारत सरकार द्वारा पारित आदिवासी भूमि अधिग्रहण कानून 1971 और पेसा कानून को ताक में रखकर खदान शुरू किया जा रहा हैं।

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पर्यावरण पर संकट

खुली खदानों की वजह से पूरे इलाके में भयंकर रूप से पर्यावरण प्रदूषण पैदा हो चुका हैं।

आस-पास के गांव में टीवी जैसी खतरनाक बीमारियां फैल रही हैं। इससे गांव का जलस्तर लगातार नीचे गिर रहा हैं।

किसानों को खेती और पीने के पानी के लिए ढेरों परेशानियों का सामना करना पड़ता है।

इन समस्याओं के मद्देनजर आदिवासी व क्रांतिकारी संगठन खुले खदानों की जगह भूमिगत खदानों को बढ़ाने की माँग लगातार कर रहे हैं।

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ठेका मज़दूरों को न्यूनतम मज़दूरी भी नहीं मिलती

ठेका मजदूरों को खदानों और उनकी कोयला उत्पादन की क्षमता अनुसार उचित मजदूरी का भुगतान नहीं किया जा रहा हैं।

जेबीसीसीआई के अनुसार हाई पॉवर कमिटी द्वारा 2012 में तय किया गया न्यूनतम वेतन भी नहीं दिया जा रहा हैं।

तय की गई मज़दूरी के लिए आईएफटीयू ने मार्च 2015 में 35 दिन की हड़ताल की। तेलंगाना सरकार और पुलिसिया दबाव के बीच दमन के बाद मजदूरों की हड़ताल समाप्त हुई।

महिला मजदूरों को बोनस भुगतान के लिए 2017 में 9 दिनों की हड़ताल के बाद बोनस का अधिकार हासिल हुआ।

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समान काम समान वेतन भी लागु नहीं

2016 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिया गया ‘समान काम समान वेतन’ कानून का सिंगरेनी खदानों में जो कि सार्वजनिक क्षेत्र का है, कोई अनुपालन नहीं किया जा रहा हैं।

इस मुद्दे को लेकर मासा और आईएफटीयू के बैनर तले मजदूरों ने 2017 में हैदराबाद मासा कन्वेंशन में आवाज बुलंद की थी।

2017 के मार्च में ‘समान काम समान वेतन’ के लिए दिल्ली के जंतर मंतर में धरना प्रदर्शन किया गया।

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स्थाई मज़दूरों को 90 हजार रुपए टैक्स देने को मज़बूर

स्थाई मजदूरों को इनकम टैक्स की वजह से साल में प्रत्यक्ष कर प्रणाली द्वारा उनकी वार्षिक कमाई से 90 हजार रुपए टैक्स लिया जा रहा हैं।

इसके खिलाफ सभी संगठन अलग अलग विरोध कर रहे हैं।

1991 में सिंगरेनी में डिपेंडेंट्स स्कीम रद्द में किया  गया था, जिसको लागू करने के लिए मजदूरों का संघर्ष जारी हैं।

मजदूरों को स्थाई कामगार भर्ती के लिए लगातार संघर्ष किया जा रहा हैं।

इन सारी विकट स्थितियों के बावजूद पूर्ववर्ती आन्ध्र व अलग राज्य बनने के बाद तेलंगाना सरकार द्वारा मजदूर हित में कोई भी योजना नहीं ली जा रही हैं।

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