इतिहास के झरोखे सेः02 अंग्रेज़ों के ज़माने में बंबई का जुझारू ट्रेड यूनियन आंदोलन

By सुकोमल सेन

(‘इतिहास के झरोखे से’, यानी लेखों की एक  ऐसी  शृ्ंखला  जिसमें मज़दूर आंदोलन के इतिहास का कोई पन्ना हमारे सामने खुलेगा। आज पढ़िये  दूसरी कड़ी में मुंबई की सूती मिलों में मज़दूर आंदोलनों के उभार के बारे में। सं.)

सन् 1924-25 की व्यापक हड़ताल के दौरान भी मुंबई के सूती कपड़ा मिल मजदूर ठीक से संगठित नहीं थे।

ए.आई.टी.यू.सी. द्वारा 1922 में मुंबई प्रांत में सेंट्रल लेबर बोर्ड की स्थापना की लेकिन इससे केवल सात यूनियन संबद्ध थीं।

शीघ्र ही यह संगठन भी अप्रभावकारी साबित हुआ। 1923 में हड़ताल के बाद तीन यूनियन को शामिल कर गिरनी कामगार संघ की स्थापना हुई लेकिन इससे संबद्ध यूनियनें छोटी और कमजोर थीं।

सन् 1926 में एन.एम.जोशी और आर.आर. बाखले की पहल से बांबे टेक्सटाइल लेबर यूनियन का गठन किया गया। आर.आर. वाखेल इसके सचिव बने।

भारतीय ट्रेड यूनियन अधिनियम (इंडियन ट्रेड यूनियन ऐक्ट) के तहत भारत में पंजीकृत यह प्रथम यूनियन थी। सन् 1928 तक इसकी सदस्यता 8,234 हो गई।

bombay cotton mill workers @RSCAMPUS
बंबई में सूती मिल मज़दूरों के संघर्ष का स्वर्णिम इतिहास रहा, अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ संघर्ष में भी उन्होंने बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया. फ़ोटो साभारः @RSCAMPUS/Twitter
ट्रेड यूनियनों के संगठित होने का दौर

मुंबई की सूती कपड़ा मजदूरों ने यद्यपि 1925 से 1927 के दौरान संगठित होना प्रारंभ कर दिया था लेकिन सूती कपड़ा मजदूरों का वास्तविक सशक्त संगठन 1928 की हड़ताल के बाद ही बना।

“गिरनी कामगार यूनियन” ही सूती कपड़ा मजदूरों की सबसे सशक्त संघर्ष शील यूनियन थी। सरकारी आंकड़ों के अनुसार इसकी सदस्यता 40,000 थी।

मुंबई के सूती कपड़ा मजदूरों की सांगठनिक कमजोरियों के बावजूद, रेलवे मजदूर, नाविक, बंदरगाह के मजदूर और डाक विभाग के कर्मचारियों की सुगठित ट्रेड यूनियनों का गठन और विकास इसी दौरान हुआ।

नियमित सदस्यता, सदस्यता राशि का संग्रह, प्रांतीय और जिला शाखाओं और अन्य तमाम संरचनात्मक विस्तार और आवश्यक गतिविधियों के साथ इन ट्रेड यूनियनों ने स्वरूप ग्रहण किया।

बंगाल के कोयला खदान मजदूरों, जूट मिलों और जमशेदपुर के स्टील उद्योग में भी ट्रेड यूनियनों का विकास हुआ। लेकिन इन यूनियनों का सांगठनिक ढांचा तुलनात्मक रूप से कमजोर था।

सन् 1925 में बंगाल जूट वर्कर्स एसोसिएशन का गठन हुआ और उसी समय रूस से लौटे शिवनाथ बनर्जी को इस यूनियन का सचिव बनाया गया।

@Film Fixer Mumbai
मुंबई में ऐसी सैकड़ों कॉटन मिलें थीं, जिनमें एक समय जुझारू मज़दूर आंदोलन था। फ़ोटो साभारः @Film Fixer Mumbai
1921 तक 10 लाख सदस्यता वाली 77 यूनियनें

सन् 1921 से 25 के दौरान भारत में कितनी यूनियनों अस्तित्व में आईं उसकी सही संख्या का पता लगाना कठिन है। डॉ. आर. के. दास ने अपनी पुस्तक ‘लेबर मूवमेंट इन इंडिया’ में सन् 1921 में 10 लाख सदस्यता वाली 77 ट्रेड यूनियनों का उल्लेख किया है। ए.आई.टी.यू.सी. के अनुसार 1922 में 113 यूनियनें थीं।

भारतीय मजदूर वर्ग के इतिहास में सर्वप्रथम 1924 में आल इंडिया ट्रेड यूनियन कांग्रेस ने व्यवस्थित ढंग से भारत की ट्रेड यूनियनों और भारतीय ट्रेड यूनियन आंदोलन की शक्ति की सही-सही सूचना एकत्र करने का प्रयास किया।

ए.आई.टी.यू.सी द्वारा 1925 में प्रकाशित ‘ट्रेड यूनियनों की निर्देशिका’ में उद्योग के आधार पर विभाजित 167 यूनियनों का वर्णन है।

ट्रेड यूनियनों का विकास सामंगी नहीं था। कुछ तो नाममात्र की सदस्यता के साथ सांगठनिक रूप से कमजोर थी। बंदरगाह के मजदूरों को संगठित करने और गोदी मजदूरों को संगठित न करने के विरोधोभास भी दिखते हैं।

‘अकुशल मजदूरों की तुलना में कुशल मजदूरों में यूनियन संबंधी उच्च चेतना की प्रवृति भी नजर आती है। इस सांगठनिक भिन्नता के चलते संघर्षों के प्रति रूख में भी बड़ा अंतर नजर आता है।

इस दौर की एक और खास प्रवृति थी प्रबंधकों द्वारा हड़ताल विरोधी यूनियनों का गठन।

उत्तर पश्चिमी रेलवे (नार्थ वेस्टर्न रेलवे) मजदूरों की हड़ताल के दौरान यूनियन के नेता जे.बी. मिलर की गिरफ्तारी के साथ ही साथ एमलगमेटेड सोसाइटी आफ रेलवे सर्वेंट्स नामक हड़ताल विरोधी यूनियन गठित कर दी गई।

Bombay Dying Textile Mill @KristoferA
ये मशहूर कपड़ा बनाने वाली कंपनी बॉम्बे डाईंग की मुंबई में पुरानी मिल का परिसर है। फ़ोटो साभारः @KristoferA/Twitter
हड़ताल तोड़ने की कोशिशें

प्रबंधकों का पूर्ण संरक्षण प्राप्त इस संगठन ने हड़ताल में तोड़-फोड़ का हर संभव प्रयास किया।

टाटा आयरन एंड स्टील वर्करों द्वारा जमशेदपुर लेबर एसोसिएशन को मान्यता न देने की परिघटना ट्रेड यूनियनों के प्रति प्रंबधकों के रुख का सटीक उदाहरण है।

मद्रास में भी “मद्रास लेबर यूनियन” के खिलाफ प्रंबधकों ने “बंकिंघम एंड कारनेटिक मिल इंपलाइज एसोसिएशन“ का गठन हड़ताल तोड़कों को संगठित करने के लिए किया।

इस दौर के मजदूर आंदोलनों का रक्षात्मक चरित्र, ए.आई.टी.यू.सी. के अधिवेशनों में भी साफ दिखा।

पहले और दूसरे सम्मेलन में मजदूरों द्वारा प्रदर्शित उत्साह और बड़ी संख्या में उनकी भागीदारी उसके बाद के सम्मेलनों में नहीं दिखाई दी। सन् 1920 के पहले सम्मेलन में 10 हजार मजदूरों का प्रतिनिधित्व था।

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Naval Mutiny @Advaidism
आज़ादी के पहले मुंबई में भातीय जल सेना यानी नेवी के सिपाहियों का विद्रोह हुआ था जिसमें सूती मिल के मज़दूरों ने बढ़चढ़ कर हिस्सा लिया था। दूसरे दिन टाइम्स ऑफ़ इंडिया प्रकाशित ख़बर। फ़ोटो साभारः @Advaidism/Twitter
यूनियन का प्रभाव घटा

सन् 1922 में यह प्रतिनिधित्व सोचनीय रूप से घट गया और सन् 1925 में स्थिति और भी खराब हो गई।

सरकार पर भी यूनियनों के घटते प्रभाव को देखा जा सकता है।

इस तथ्य के बावजूद कि ए.आई.टी.यू.सी ने जोसेफ बपतिस्पा को इंटरनेशनल लेबर आर्गेनाइजेशन के छठे सम्मेलन में भारतीय मजदूरों का प्रतिनिधित्व करने के लिए चुना।

सरकार ने उनको भेजने से इनकार कर दिया और उनके बदले कानपुर के के.सी. राय चौधरी को भेजा।

बंगाल प्राविंशियल ट्रेड यूनियन कांग्रेस और आल इंडिया ट्रेड यूनियन कांग्रेस ने के.सी. राय चौधरी के नामकरण के खिलाफ प्रतिरोध भी किया लेकिन सरकार का फैसला अपरिवर्तित रहा।

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