इतिहास के झरोखे से-4: 1930 में रेलवे की वो खूनी हड़ताल

By सुकोमल सेन

(‘इतिहास के झरोखे से’, यानी लेखों की एक ऐसी शृंखला जिसमें मज़दूर आंदोलन के इतिहास का कोई पन्ना हमारे सामने खुलेगा। आज पढ़िए  चौथी कड़ी में  जी.आई.पी. रेलवे में हड़ताल के बारे में।)

ग्रेट इंडियन पेनीसुलर रेलवे में कम्युनिस्टों के नेतृत्व में एक सशक्त यूनियन का गठन किया गया।

4 फरवरी 1930 को जी.आई.पी. रेलवे में प्रारम्भ होने वाली हड़ताल इस यूनियन के नेतृत्व में ही शुरू हुई।

मज़दूरों की मुख्य मांगें थीं, वेतन वृद्धि, बर्खास्तगी और अन्य उत्पीड़नों पर रोक, यूनियन कार्यकर्ताओं का मनमाना ढंग से स्थानांतरण और मज़दूरों की छंटनी पर रोक।

यूनियन ने बेहद अधिक काम के घंटे में कमी और रंगभेद की समाप्ति और ऐसी ही कुछ अन्य समस्याओं को भी उठाया।

सांकेतिक। फोटो साभारः @ nuneatonhistory.
 न्यूनतम मज़दूरी में बढ़ोतरी की मांग

उस समय रेलवे में काम कर रहे 33,000 से अधिक मज़दूरों का मासिक वेतन 15 रुपए से कम था।

एक अच्छी- खासी संख्या में मज़दूर बेहद कम, मात्र 8 से 9 रूपए प्रति माह कमा पाते थे।

इस रेलवे के 17000 से अधिक मज़दूरों को 30 रुपए से कम वेतन मिलता था।

इस दरिद्रतापूर्ण स्थिति में सुधार के लिए यूनियन ने आम मज़दूरी में 10 प्रतिशत की वृद्धि और न्यूनतम मज़दूर 30 रूपए प्रति माह तय करने की मांग की।

यह हड़ताल जो सभी रेलवे में फ़ैल गयी, इसे व्यापक मज़दूरों का समर्थन प्राप्त हुआ।

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सांकेतिक फोटो। फोटो साभार फेसबुक
मज़दूरों को बेघर किया गया 

अन्य हड़तालो की तरह रेलवे अधिकारियों ने इस हड़ताल को भी तोड़ने के लिए आतंक बरपा किया।

पुलिस और सेना के ज़रिये मज़दूरों को उनके घरों से बाहर निकल दिया गया, रेलवे कालोनियों में पानी की सप्लाई बंद कर दी गयी और बड़े पैमाने पर मज़दूरों को गिरफ्तार किया गया।

प्रबंधन ने हड़तालियों की जगह पर नयी भर्ती भी करनी चाही।

इस हड़ताल को व्यापक समर्थन मिलने वाला था, लेकिन यूनियन द्वारा संघर्ष संचालित करने में केवल दृढ़ निश्चय और जुझारूपन अन्य लोगों को जोड़ने के लिए पर्याप्त नहीं था।

उस रेलवे की एक और यूनियन इस हड़ताल के पक्ष में नहीं थी ऐसी परिस्थितियों में बहुत से लोगों ने मज़दूरों की मांग पर पंचनिर्णय की बात की।

रेलवे बोर्ड द्वारा निम्न प्रस्तावों पर सहमती

मज़दूरों की तरफ से आल इंडिया रेलवे मेंस फेडरेशन का एक प्रतिनिधि मंडल, रेलवे बोर्ड के अधिकृत इंचार्ज, जॉर्ज रेनी से मिला। रेलवे बोर्ड छूट के निम्न प्रस्तावों पर सहमत हुआ :

हड़ताल में शामिल होने के लिए कोई दंड नहीं, कम मज़दूरी पाने वाले मज़दूरों के वेतन में शीघ्र संशोधन, यूनियन को मान्यता और यूनियन के उपाध्यक्ष डी.बी कुलकर्णी को डाक्टरी जांच में स्वस्थ घोषित होने के बाद पुनः नौकरी देना।

लेकिन बोर्ड ने यूनियन के एक और कार्यकर्ता वी.बी. पूर्णदार को नौकरी पर लेने से इंकार कर दिया।

इन शर्तों पर समझौते में वी.वी. गिरी, चमन लाल और एन.एम.जोशी ने मज़दूरों से 15 मार्च को काम पर लौटने का आह्वान किया।

यह समझौता यूनियन के अध्यक्ष आर.एस. रूईकर और कुछ अन्य नेतृत्वकारी सदस्यों विषेशकर कम्युनिस्टों को स्वीकार नहीं था। यद्यपि अंत में उन्होंने भी हड़ताल वापस लेने का निर्णय स्वीकार किया।

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भारतीय रेलवे में क़रीब 13 लाख से अधिक कर्मचारी काम करते हैं। फ़ोटोः स्क्रीशॉट
मज़दूरों की छंटनी पर,  मज़दूरों का आक्रोश

हड़ताल समाप्त हो जाने के बाद प्रबंधन के मातुंगा वर्कशाप से 1500 से 2000 मज़दूरों तक की छंटनी करने का अपना निर्णय घोषित किया।

इस घोषणा ने जानबूझ कर मज़दूरों को कुपित कर दिया। हड़ताल कमेटी की बैठक 24 मार्च को मुंबई में हुई।

कमेटी ने छंटनी वापस न होने तक विभिन्न केंद्रों पर शांतिपूर्ण सत्याग्रह और धरना करने का निर्णय लिया।

सत्याग्रह 10 अप्रैल को होना था। इसी बीच गिनवाल द्वारा एक विवाद में समझौता होने की असफलता का समाचार फ़ैल गया। विवाद ने मज़दूरों को आक्रोशित कर दिया।

अप्रैल को क्रोधित मज़दूरों ने एक विशाल सभा आयोजित की और प्रदर्शन किया।

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हड़ताल के दौरान मज़दूरों पर लाठीचार्ज। फ़ोटो साभारः @ nuneatonhistory.
मजदूरों पर अत्याचार :- दो की हत्या और पचास घायल

जोगलेकर ने बताया कि ‘प्रदर्शन के बाद लोग विक्टोरिया टर्मिनल से ट्रेन पकड़ कर अपने-अपने घर जाना चाहते थे।

लेकिन रेलवे अधिकारियों ने मज़दूरों पर हमला करने के लिए पुलिस बुला ली। मज़दूरों ने रेल में यात्रा करने पर जोर दिया।

पुलिस ने हमला शुरू कर दिया और बराबर लाठी चार्ज और गोलियां चलाई गईं। दो हड़ताली मज़दूरों की हत्या हो गई और पचास से अधिक घायल हो गए।

जोगलेकर द्वारा इस तरह की घटनाओं का वर्णन करने पर ‘अपने दो कामरेडों की हत्या से मज़दूर क्रोधित हो गए और वह हड़ताल कमेटी के निर्णय का इंतज़ार किये बिना तत्काल कोई कार्रवाई करना चाहते थे।

उन्होंने कुर्ला के बीच रेल रोक दी और पुलिस ने फिर सत्याग्रही मज़दूरों पर गोली चला दी। रेलवे के विभिन्न केंद्रों पर सत्याग्रह करने वाले अधिकतर मज़दूरों को जेल में डाल दिया गया।

15 अप्रैल को मुंबई में हड़ताल समाप्ति का निर्णय

यूनियन के अध्यक्ष आर.एस. रुइकर को भी आज्ञा का उलंघन कर एक सभा को सम्बोधित करने के आरोप में जेल में डाल दिया गया।

इस हमले के दौरान यूनियन की कार्यकारिणी की बैठक 15 अप्रैल को मुंबई में हुई। कार्यकारिणी ने हड़ताल समाप्त करने का निर्णय किया।

यह हड़ताल मज़दूरों द्वारा बहुत भली प्रकार संगठित और अनुशासित थी। इस दौर की यह एक बड़ी और प्रमुख हड़ताल थी।

इसमें 22,600 से अधिक मज़दूरों ने भागीदारी की।

यूनियन और हड़ताल कमेटी की संगठित कार्रवाई और कम्युनिस्ट की सक्रिय उपस्तिथि ने इस हड़ताल को असाधारण जुझारूस्वरूप और गति प्रदान की।

(सुकोमल सेन की किताब ‘भारतीय मज़दूर वर्गः उद्भव और आंदोेलन का इतिहास’ से साभार। टंकण- शोभा मेहता)

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