पत्रकारों का वेज बोर्ड ही ख़त्म कर दिया मोदी सरकार ने, मजीठिया की लड़ाई अधर में

संसद में वेज कोड या मज़दूरी संहिता पास होने के साथ ही पत्रकारों का वेज वोर्ड अब इतिहास की बात हो गई है।

पत्रकारों का अंतिम वेज बोर्ड मजीठिया वेज बोर्ड था और इसे सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर 7 फ़रवरी 2014 से लागू किया गया, भले ही आधा अधूरा ही सही।

वेज कोड के तहत अब पत्रकारों के वेतन का निर्धारण भी राष्ट्रीय स्तर पर फ्लोर लेवल रेट से तय होगा।

मीडियाकर्मियों के वेतन के लिए 1955 में अलग वेज बोर्ड बनाया गया था तबसे किसी सरकार ने इसे छेड़ा नहीं।

बल्कि जब यूपीए-2 की मनमोहन सरकार ने मजीठिया वेजबोर्ड की सिफ़ारिशों को लागू करने के आदेश दिए तो मीडिया हाउसों के मालिक सुप्रीम कोर्ट पहुंच गए।

सुप्रीम कोर्ट ने भी आदेश दे दिया, उसके बावजूद अभी तक ये चंद संस्थानों में भी लागू हो पाया वो भी आधा अधूरा।

मजीठिया वेज बोर्ड को लागू कराने के लिए पत्रकारों ने लंबी कानूनी लड़ाई लड़ी और इस दौरान हज़ारों पत्रकारों को नौकरी से हाथ धोना पड़ा।

जब मोदी सरकार आई तो पत्रकारों को उम्मीद बंधी कि उन्हें न्याय मिलेगा। लेकिन पांच साल मामला लटका रहा और अब दूसरा कार्यकाल पाते ही मोदी सरकार ने वेज बोर्ड ही ख़त्म करने का ऐलान कर दिया।

आपसी फूट से सरकार को मिली ताक़त

न ज़ाहिर करने की शर्त पर एक वरिष्ठ पत्रकार कहते हैं, “जब पत्रकार बहुत मजबूत स्थिति में थे, तब उन्होंने अपनी यूनियन की एकता और इसके सहारे मज़दूर वर्ग का विश्वास हासिल करने पर ध्यान नहीं दिया। अब जब उनके अधिकारों पर ही हमला हो रहा है तो उन्हें समझ नहीं आ रहा कि क्या करें, किसके पास जाएं।”

वो कहते हैं, “मीडिया कर्मियों में भी एक बड़ा तबका मोदी प्रशंसक रहा है और उसकी ख़बरों में भी गाहे बगाहे दिखता रहा है। अब जब चोट लगी है तो इसे वो ‘देश के लिए कुर्बानी’ की तरह ले रहा है।”

इसमें कोई शक नहीं कि पत्रकारों में मज़दूर वर्गीय चेतना से लगातार दूर जाने की वजह से उसकी एकता छिन्न भिन्न हुई और उनमें शासक वर्गों के कई कठपुतली धड़े बन गए।

इसीलिए न वेज बोर्ड बनने के बावजूद न तो वे कभी उसे लागू करा पाए और न ही मालिकों पर कोई दबाव बना पाए।

इसमें शक नहीं कि वेजबोर्ड से हज़ारों पत्रकारों का फायदा मिला है, लेकिन बड़े पत्रकारों की उदासीनता के चलते मालिक इसे अप्रासंगिक बनाने में सफल रहे।

मज़दूरी तय करने का फ़ार्मूला बदला

केंद्र सरकार 44 श्रम क़ानूनों को ख़त्म करके चार श्रम संहिताएं या लेबर कोड लेकर आ रही है, जिसमें वेज कोड संसद से पास भी कर दिया गया है।

वेज कोड में मौजूदा 4 श्रम क़ानून – न्यूनतम मजदूरी अधिनियम, मजदूरी भुगतान अधिनियम, बोनस भुगतान अधिनियम और समान मुआवज़ा अधिनियम समाप्त हो जाएंगे।

वेतन संहिता विधेयक में मज़दूरी तय करने के उस फार्मूले को पूरी तरह से बदल दिया है, जिसे 15वें भारतीय श्रम सम्मेलन में तय किया गया था।

केन्द्रीय श्रम राज्य मंत्री ने 10 जुलाई को 4,628 रुपए प्रति माह (178 रुपये दैनिक) राष्ट्रीय न्यूनतम वेतन की घोषणा की है।

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One thought on “पत्रकारों का वेज बोर्ड ही ख़त्म कर दिया मोदी सरकार ने, मजीठिया की लड़ाई अधर में

  • August 19, 2019 at 8:57 am
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    Jo bhi hoga, it’s for future, and any amount fixed as wages will be higher than existing wages recommended by majithia wage board.

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