175 साल बाद आई हिंदी में ‘इंग्लैंड में मजदूर वर्ग की दशा’ किताब

मज़दूरों के महान नेता फ़्रेडरिक एंगेल्स की किताब ‘इंग्लैंड में मजदूर वर्ग की दशा’ किताब पर दिल्ली के प्रगति मैदान में लगे विश्व पुस्तक मेले में 11 जनवरी को वर्कर्स यूनिटी की ओर से एक परिचर्चा का आयोजन किया गया।

इस किताब का अनुवाद दिगंबर ने किया है। परिचर्चा में पंकज बिष्ट, दिगम्बर, संतोष, अभिषेक परमार आदि ने अपने विचार रखे और भारत के मज़दूर वर्ग की दशा को लिपिबद्ध करने पर ज़ोर दिया गया।

एंगेल्स ने अपनी पुस्तक के पहले अध्या्य बड़ बड़े शहर में, मज़दूरों के रहने वाली जगहों के बारे में लिखते हैं-

…उमें ऐसे बेहूदे और डरावने मकान बने हैं, जैसे मैंने आजक नहीं देखे। इनमें से एक बरामदे में ढके हुए गरियारे के आखिरी छोर पर सीधे प्रवाश द्वार पर बिना दरवाजे वाला एक संडास बना हुआ है, इतना गंदा कि वहां रहने वालों को उस बरामदे में आते जाते उसमें जमा पेशाब और पाखाने के घिनौने कुंड से होकर गुजरना पड़ता है। नीचे इर्क नाला बहता है या कहिए जमा रहता है, एक संकरा कोयले जैसा काला, बदबूदार नाला, कूड़े कचरे और मलबे से भरा जिनको यह छिछले दाहिने किनारे पर जमा करता है। सूखे मौसम में इस किनारे पर बेहद घिनौने कालापन लिए हरे, कीचड़ का ऊंचा ढेर ठहरा रहता है, जिससे रोग फैलाने वाली गैस लगातार निकलती रहती है और ऐसी बदबू छोड़ती है कि नाके की सतह से 40-50 फुट ऊपर पुल तक पहुंच जाती है। लेकिन इसके अलावा यह नाला खुद ही हर कुछ कदम बाद बांध के जरिए रोका गया है, जिसे पीछे भारी मात्रा में कीचड़ और कूड़ा कचरा इकट्ठा होता है और सड़ता रहता है। पुल के आगे चमड़े, हड्डी और गैस की फ़ैक्ट्रियां हैं, जिनका सारा कूड़ा और गंदा पानी इर्क में ही आकर गिरता है, जिसमें आगे चलकर आसपास के सभी गंदे नालों और पाखानों का पानी आकर मिलता है। इस बात की कल्पना आसानी से की जा सकती है कि इस नाले में किस तरह के अवशिष्ट जमा होते हैं….

ये किताब पुस्तक मेले के हॉल नंबर 12ए में स्टाल नंबर 6, गार्गी प्रकाशन पर उपलब्ध है।

(वर्कर्स यूनिटी स्वतंत्र निष्पक्ष मीडिया के उसूलों को मानता है। आप इसके फ़ेसबुकट्विटर और यूट्यूब को फॉलो कर इसे और मजबूत बना सकते हैं।)

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *