आदिवासियों का जुझारू प्रदर्शन, झुकना पड़ा अडानी और सरकार को

पर्यावरण बचाने के करोड़ों के धंधे से अलग छत्तीसगढ़ के आदिवासियों ने सरकार को गिरेबां में झांकने पर मज़बूर कर दिया। एक तरफ़ पूरे देश में 50 डिग्री सेल्सियस तापमान से पर्यावरण बचाने की हहाकार मची थी, दूसरी ओर छत्तीसगढ़ के बैलाडीला की पहाड़ियों में 20 हज़ार पेड़ काटे जा रहे थे और जलाए जा रहे थे।

पर्यावरण के सबसे हितैषी आदिवासियों ने पेड़ों को बचाने के लिए देश के सबसे ताक़तवर उद्योगपति अदानी के ख़िलाफ़ छह जून को मोर्चा खोल दिया. आदिवासी अपना राशन पानी के साथ दूर दराज़ इलाकों से पैदल चलकर बैलाडिला आए और यहीं जम गए।

सात दिन तक बैलाडिला में रात दिन धरना पर बैठे आदिवासियों की बात सरकार को सुननी पड़ी। और 2014 में अदानी के ख़दान के लिए हुई ग्रामसभा की जांच के आदेश दे दिए गए।

आदिवासियों का आरोप है कि ग्रामसभा में धोखाधड़ी की गई थी और ज़बरदस्ती हस्ताक्षर लिए गए थे। इस तरह राष्ट्रीय खनिज विकास निगम (एनएमडीसी) ने 13 नंबर पहाड़ी को लौह अयस्क खनन के लिए अदाणी समूह को दे दिया।

और अदाणी ग्रुप ने यहां 20,000 जिंदा पेड़ों को काट डाला और नामोनिशान मिटाने के लिए उन्हें जलाना भी शुरू कर दिया।

आदिवासी सबकुछ सह सकते हैं लेकिन पर्यावरण का नाश बिल्कुल नहीं। इसलिए लगभग 200 गांवों के आदिवासी अपने तीर-धनुष के साथ बैलाडिला पहुंच गए। एनएमडीसी पिछले 60 सालों से बैलाडिला के पर्वतों पर कच्चे लोहे का खनन कर रहा है।

संयुक्त पंचायत संघर्ष समिति के आदिवासी नेताओं का कहना है कि डिपॉजिट 13 नंबर पहाड़ में हमारे देवी-देवताओं का वास है। हम किसी भी सूरत में पहाड़ को खोदने नहीं देंगे।

ध्यान देने वाली बात है कि पूरा बस्तर संभाग पांचवीं अनुसूची में आता है और इस पर पंचायती राज्य अधिनियम 1996 लागू होता है।

इसमें ग्रामसभा की अनुमति के बिना, एक इंच जमीन न तो केंद्र सरकार और न राज्य सरकार ले सकती है। प्रदर्शन के सातवें दिन आदिवासियों ने 15 दिनों के अल्टीमेटम के साथ प्रदर्शन स्थगित करने की घोषणा की है। लेकिन ये लड़ाई कब ख़त्म होगी, कहना मुश्किल है।

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