मोदी सरकार को ‘श्रम की बात’ सुनाने दिल्ली पहुंचे 20 राज्यों के हज़ारों मज़दूर

बीते रविवार को दिल्ली में मज़दूरों की बड़ी रैली हुई।

मज़दूर अधिकार संघर्ष अभियान यानी मासा के बैनर तले क़रीब 20 राज्यों के मज़दूर दिल्ली पहुंचे थे।

मासा में क़रीब डेढ़ दर्जन ट्रेड यूनियन शामिल हैं। दिन में क़रीब 12 बजे रामलीला मैदान से ये रैली निकल कर संसद मार्ग पहुंची।

हज़ारों की तादाद में शामिल मज़दूरों के हाथों में लाल झंडा और सिर पर रेड कैप थी।

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न्यूनतम वेतन 25,000 रु. करने की मांग

रैली में औद्योगिक मज़दूर से लेकर खेतिहर मज़दूर तक केरल से लेकर पश्चिम बंगाल तक के आए हुए थे। मज़दूरों ने सरकार को 17 सूत्रीय मांगें सौंपी, जिनमें तीन प्रमुख मांग थी।

पहली, न्यूनतम वेतन 25,000 रुपये प्रति माह किया जाए दूसरी, ठेकेदारी प्रथा ख़त्म की जाए।

और तीसरी, श्रम कानूनों में जो मज़दूर विरोधी बदलाव किए गए हैं, उन्हें वापस लिया जाए।

दरअसल मोदी सरकार ने केंद्रीय श्रम कानूनों में ऐसे बदलाव किए हैं, जिससे परमानेंट नेचर की नौकरियां भी ख़त्म हो रही हैं।

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रामलीला मैदान में बैठीं आंगनबाड़ी महिला मज़दूर। फ़ोटोः वर्कर्स यूनिटी
आंगनबाड़ी महिलाओं की रैली

अप्रेंटिस एक्ट में बदलाव, फिक्स टर्म एम्प्लायमेंट कानून और नीम परियोजना ऐसे ही बदलाव हैं जिनसे फैक्ट्रियों में छह छह महीने पर कांट्रैक्ट लेबर रखे जा रहे हैं।

रविवार को ही मज़दूरों की एक दूसरी बड़ी रैली हुई, जिसमें दिल्ली और आस पास के इलाकों के आंगनबाड़ी कार्यकर्ताएं शामिल हुईं।

आंगनबाड़ी महिलाओं को न्यूनतम वेतन भी नहीं दिया जाता। इनकी मांग है कि उन्हें मज़दूर माना जाए और उन्हें मज़दूरों का हक़ दिया जाए।

इन दोनों रैलियों का मंच संसद मार्ग पर 200 मीटर के अंतर पर लगा हुआ था।

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